UP में बिजली संकट क्यों बना बेकाबू? डिमांड रिकॉर्ड पर, सिस्टम पुराना… गर्मी में बढ़ी लोगों की मुश्किलें

UP में बिजली संकट क्यों बना बेकाबू? डिमांड रिकॉर्ड पर, सिस्टम पुराना… गर्मी में बढ़ी लोगों की मुश्किलें

उत्तर प्रदेश इस समय दोहरी मार झेल रहा है. एक तरफ भीषण गर्मी लोगों को परेशान कर रही है, तो दूसरी तरफ लगातार हो रही बिजली कटौती ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं. गांवों से लेकर शहरों तक लोग घंटों बिजली गुल रहने की शिकायत कर रहे हैं. यहां तक कि राजधानी लखनऊ भी इससे अछूती नहीं है. अब यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है.

राज्य सरकार जहां बिजली संकट से निपटने के दावे कर रही है, वहीं विपक्ष इसे “महाआपदा” बता रहा है. लेकिन सवाल सबसे बड़ा यही है कि आखिर इतने बड़े राज्य में बिजली उत्पादन होने के बावजूद लोगों तक निर्बाध सप्लाई क्यों नहीं पहुंच पा रही?


डिमांड बढ़ी रिकॉर्ड स्तर पर, लेकिन सिस्टम नहीं हुआ अपडेट

उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री ने दावा किया कि मौजूदा सरकार के दौरान बिजली व्यवस्था में बड़ा विस्तार हुआ है. उनके मुताबिक साल 2017 में प्रदेश में बिजली की औसत मांग करीब 13 हजार मेगावाट थी, जो अब बढ़कर 30 हजार मेगावाट के आसपास पहुंच गई है. इसी तरह बिजली उपभोक्ताओं की संख्या भी 1.80 करोड़ से बढ़कर 3.70 करोड़ हो चुकी है.

सरकार का कहना है कि उत्पादन क्षमता भी लगातार बढ़ाई गई है. 2017 में जहां प्रदेश का अधिकतम तापीय उत्पादन करीब 5160 मेगावाट था, वहीं अब यह 9000 मेगावाट से ज्यादा हो चुका है.

लेकिन असली समस्या उत्पादन में नहीं, वितरण व्यवस्था में सामने आ रही है. अधिकारियों के मुताबिक पिछले 9-10 वर्षों में उपभोक्ता और लोड लगभग दोगुना हो गया, जबकि डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर पुराने ढांचे पर ही टिका रहा. यही वजह है कि बढ़ते लोड के साथ ट्रांसफार्मर, केबल और उपकेंद्र जवाब देने लगे हैं.


बिजली है, लेकिन घरों तक पहुंचाने में हो रही दिक्कत

विद्युत निगम के अधिकारियों के अनुसार प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती ओवरलोडेड सेकेंड्री सिस्टम है. यानी बिजली उत्पादन पर्याप्त होने के बावजूद वितरण नेटवर्क कमजोर पड़ रहा है. पुराने तार, क्षमता से ज्यादा लोड और तकनीकी खराबियां कटौती की बड़ी वजह बन गई हैं.

जानकारों का कहना है कि अनप्लैंड तरीके से विकसित हुई कॉलोनियों और तेजी से बढ़ते शहरी इलाकों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है. वहां बिजली का ढांचा कभी मौजूदा आबादी और खपत के हिसाब से तैयार ही नहीं किया गया.

स्थिति यह है कि सरकार बिजली खरीद भी रही है, लेकिन उसे सुरक्षित तरीके से सप्लाई करना चुनौती बन गया है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की ट्रांसमिशन क्षमता लगभग 31,500 मेगावाट है. अगर इससे ज्यादा सप्लाई देने की कोशिश हो, तो कई उपकेंद्र ट्रिप कर सकते हैं. इसी वजह से मांग बढ़ने के बावजूद सप्लाई सीमित करनी पड़ रही है.


कर्मचारियों की कमी ने बढ़ाई मुश्किलें

पूर्व अधिकारियों का कहना है कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए कई योजनाएं बनीं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम पर्याप्त नहीं हुआ. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि तकनीकी समझ की कमी और फील्ड स्टाफ की कमी ने हालात और बिगाड़े हैं.

जानकारी के मुताबिक यूपी में करीब 30 हजार संविदा कर्मचारियों को हटाया गया है. यही कर्मचारी ट्रांसफार्मर रिपेयर, केबल फॉल्ट और लोकल लाइन दिक्कतों को ठीक करने का काम करते थे. कर्मचारियों की कमी का असर अब सीधे मरम्मत कार्यों पर दिखाई दे रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इंजीनियर योजना बना सकते हैं, लेकिन ग्राउंड पर लाइनमैन और तकनीकी स्टाफ की कमी होने से छोटी खराबियां भी लंबे समय तक बनी रहती हैं.


गर्मी बढ़ी तो बिजली संकट और गहराया

भीषण गर्मी के बीच प्रदेश में बिजली की मांग लगातार रिकॉर्ड स्तर पर बनी हुई है. आंकड़ों के मुताबिक कई बार मांग 30 हजार मेगावाट के पार पहुंच चुकी है. सरकार ने बिजली एक्सचेंज से अतिरिक्त बिजली भी खरीदी, लेकिन इसके बावजूद पीक आवर्स में कमी दर्ज की गई.

यानी साफ है कि समस्या सिर्फ बिजली उत्पादन की नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से लोगों तक पहुंचाने की है. जब तक वितरण नेटवर्क मजबूत नहीं होगा, तब तक बढ़ती मांग के साथ बिजली संकट बार-बार सामने आता रहेगा.

फिलहाल गर्मी और बढ़ने की आशंका है. ऐसे में आने वाले दिनों में यूपी की बिजली व्यवस्था सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन सकती है.