प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी यात्रा और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विस्तार को लेकर राजनीतिक हलकों में लगातार चर्चा हो रही है। लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की तुलना देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की जा रही है, जिन्होंने भी लगातार तीन आम चुनावों में जीत दर्ज की थी। हालांकि दोनों नेताओं के दौर, राजनीतिक परिस्थितियों और चुनौतियों में बड़ा अंतर रहा है। एक तरफ नेहरू आजादी के बाद कांग्रेस के स्वाभाविक राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ चुनावी मैदान में उतरे थे, वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने ऐसे समय में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया, जब भाजपा लगातार दो लोकसभा चुनाव हार चुकी थी और पार्टी नेतृत्व संकट से जूझ रही थी। यही वजह है कि मोदी की चुनावी उपलब्धियों और भाजपा के विस्तार को भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जा रहा है।
नेहरू और मोदी के दौर की राजनीति में बड़ा अंतर
जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और आजादी से पहले ही देश के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा बन चुके थे। 1951-52 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस के पास मजबूत संगठन, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और जनता का व्यापक समर्थन था। उस समय विपक्ष अपेक्षाकृत कमजोर था और संसाधनों के मामले में कांग्रेस के सामने कहीं नहीं ठहरता था।
इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी 2014 में ऐसे राजनीतिक माहौल में राष्ट्रीय स्तर पर उभरे, जहां गठबंधन राजनीति लंबे समय से देश की पहचान बन चुकी थी। भाजपा 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव हार चुकी थी। पार्टी का मनोबल गिरा हुआ था और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए सत्ता में था। ऐसे समय में मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया।
गुजरात से दिल्ली तक, संघर्ष से बनी राष्ट्रीय पहचान
नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत साधारण पृष्ठभूमि से शुरू हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहने के बाद उन्होंने भाजपा संगठन में कार्यकर्ता के रूप में काम किया और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान दिलाई।
इस दौरान उन्हें राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन भाजपा समर्थकों का मानना है कि हर चुनौती के बाद उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और मजबूत हुई। 2013 में जब भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय चुनाव अभियान की कमान सौंपी, तब पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह नई राजनीतिक ऊर्जा दिखाई दी।
2014 में बदला राजनीतिक समीकरण, BJP को मिला नया विस्तार
2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के इतिहास का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। पार्टी ने 2009 की 116 सीटों से छलांग लगाकर 282 सीटें हासिल कीं और पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इसके साथ ही 25 वर्षों से चली आ रही गठबंधन युग की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
2019 में भाजपा ने अपना प्रदर्शन और बेहतर किया तथा 303 सीटों के साथ दोबारा सत्ता में लौटी। इस दौरान पार्टी का सामाजिक और भौगोलिक विस्तार भी बढ़ा। भाजपा, जो कभी मुख्य रूप से शहरी और कुछ राज्यों तक सीमित मानी जाती थी, उसने ग्रामीण क्षेत्रों, पिछड़े वर्गों और नए सामाजिक समूहों तक अपनी पहुंच बनाई।
तीसरे कार्यकाल में भी कायम है राजनीतिक प्रभाव
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सीटों के मामले में कुछ नुकसान जरूर हुआ और पार्टी 240 सीटों पर आ गई, लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और एनडीए के सहयोगियों के साथ सरकार बनाने में सफल रही। इसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों में भी भाजपा ने महत्वपूर्ण जीत दर्ज की।
लेख के अनुसार, आज भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकारें देश के लगभग 72 प्रतिशत हिस्से पर शासन कर रही हैं। हरियाणा, महाराष्ट्र, असम, त्रिपुरा, बिहार, दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत की है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मोदी युग की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि भाजपा ने खुद को केवल एक कैडर आधारित पार्टी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे व्यापक जनाधार वाली चुनावी मशीन में बदल दिया। संगठन, चुनावी रणनीति, नेतृत्व और लगातार सक्रिय राजनीतिक अभियान ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा है।
यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की चुनावी यात्रा को आज भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अध्यायों में गिना जा रहा है, जिसकी तुलना अक्सर देश के शुरुआती दशकों के बड़े राजनीतिक नेताओं से की जाती है।


