उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था पर रोक लगाने के बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया है। सरकार अगले सप्ताह हाईकोर्ट की डबल बेंच या आवश्यकता पड़ने पर फुल बेंच के समक्ष अपील दाखिल करेगी। सरकार का मानना है कि उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) अभी भी प्रभावी है और इसी के आधार पर वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था की जा सकती है।
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 25 जून को अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा था कि संविधान के अनुरूप ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिन प्रावधानों को पहले ही असांविधानिक माना जा चुका है, उनके आधार पर ग्राम प्रधानों को प्रशासक की भूमिका नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को पंचायत चुनाव की दिशा में ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं।
13 जुलाई तक मांगी चुनाव की रूपरेखा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को 13 जुलाई तक पंचायत चुनाव कराने की रूपरेखा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243(ई) और 243(के) पंचायतों के कार्यकाल और चुनाव की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हैं। संविधान के अनुसार किसी भी पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं हो सकता और समय पर चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक कारणों या अन्य बहानों के आधार पर पंचायत चुनाव को अनिश्चितकाल तक टालना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। इसलिए सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों को समयबद्ध तरीके से चुनाव कराने की दिशा में कार्रवाई करनी होगी।
सरकार का तर्क क्या है?
शासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12 की उपधारा (3-ए) अभी भी कानून का हिस्सा है। इस प्रावधान के अनुसार यदि अपरिहार्य परिस्थितियों या व्यापक लोकहित में पंचायत चुनाव समय पर कराना संभव न हो, तो राज्य सरकार अथवा उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता है। इसमें प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति का प्रावधान भी शामिल है।
सरकार का कहना है कि यह प्रावधान वर्ष 1994 में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था और इसे अब तक विधायिका द्वारा निरस्त नहीं किया गया है। इसलिए इसकी वैधानिक स्थिति बनी हुई है। सरकार इसी आधार पर हाईकोर्ट की एकल पीठ के फैसले को चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
क्या है धारा 12(3-ए)?
उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम की धारा 12(3-ए) का उद्देश्य उन परिस्थितियों से निपटना था, जब किसी कारणवश पंचायत चुनाव समय पर कराना संभव न हो। ऐसे मामलों में पंचायतों के प्रशासनिक कार्य बाधित न हों, इसके लिए सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था करने का अधिकार दिया गया था।
इस व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त किए जा सकते हैं या प्रशासनिक समितियों के माध्यम से पंचायतों का संचालन किया जा सकता है। हालांकि, इस अधिकार का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना था।
प्रेम लाल पटेल केस का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पहले दिए गए प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में न्यायालय ने कहा था कि धारा 12(3-ए) का इस्तेमाल चुनावों को अनिश्चितकाल तक टालने या ग्राम प्रधानों अथवा प्रशासकों का कार्यकाल मनमाने तरीके से बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना था कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 243 की भावना के विपरीत होगा। इसी आधार पर वर्तमान मामले में भी एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि समाप्त हो चुके कार्यकाल वाले ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका
भारतीय संविधान के अनुसार पंचायत चुनाव कराने का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग के पास है। अनुच्छेद 243(के) राज्य निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा देता है। इसका उद्देश्य पंचायत और नगरीय निकायों के चुनावों को निष्पक्ष, समयबद्ध और स्वतंत्र तरीके से कराना है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला देकर चुनाव में अनावश्यक देरी नहीं कर सकती। यदि चुनाव समय पर नहीं कराए जाते हैं तो यह संविधान की मंशा के विपरीत माना जाएगा।
सरकार क्यों करेगी अपील?
सरकार का मानना है कि एकल पीठ ने जिस प्रावधान को आधार बनाकर आदेश दिया है, उसकी अलग कानूनी व्याख्या भी संभव है। चूंकि धारा 12(3-ए) अभी भी अधिनियम में मौजूद है, इसलिए सरकार का पक्ष है कि जब तक विधानमंडल इसे समाप्त नहीं करता, तब तक इस प्रावधान का उपयोग पूरी तरह अवैध नहीं माना जा सकता।
इसी कानूनी आधार पर सरकार अगले सप्ताह डबल बेंच में विशेष अपील दाखिल करेगी। यदि आवश्यकता हुई तो मामला बड़ी पीठ के समक्ष भी ले जाया जा सकता है।
जस्टिस राम औतार ने की पुष्टि
राज्य सरकार के अपील करने के निर्णय की पुष्टि उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष एवं इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह ने भी की है। उन्होंने कहा कि सरकार उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के आधार पर न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखेगी।
पंचायत चुनाव पर क्या पड़ेगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार की अपील पर शीघ्र सुनवाई होती है तो पंचायत चुनाव की समय-सीमा और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर स्पष्टता आ सकती है। वहीं यदि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहता है तो सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग पर निर्धारित समय में चुनाव कराने का दबाव और बढ़ जाएगा।
प्रदेश में लाखों ग्राम पंचायतों का प्रशासन फिलहाल संक्रमण काल से गुजर रहा है। ऐसे में अदालत का अंतिम निर्णय पंचायतों के भविष्य, प्रशासनिक व्यवस्था और चुनाव कार्यक्रम पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।
राजनीतिक महत्व
उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव केवल स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं माना जाता, बल्कि इसे प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले अहम चुनावों में भी गिना जाता है। पंचायत स्तर पर चुने जाने वाले प्रतिनिधि भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल पंचायत चुनाव को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
सरकार और विपक्ष दोनों की नजर अब हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर है। यदि सरकार की अपील स्वीकार होती है तो पंचायत प्रशासन को लेकर नई व्यवस्था लागू हो सकती है, जबकि आदेश बरकरार रहने की स्थिति में चुनाव प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाना होगा।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें राज्य सरकार द्वारा दायर की जाने वाली अपील और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। इसके साथ ही 13 जुलाई तक चुनाव की रूपरेखा प्रस्तुत करने के निर्देश के मद्देनजर राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियां भी महत्वपूर्ण होंगी। आने वाले दिनों में अदालत का फैसला यह तय करेगा कि पंचायतों का प्रशासनिक संचालन किस प्रकार होगा और प्रदेश में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया किस समय शुरू होगी।



