कावेरी जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला सिर्फ अदालतों और सरकारी आदेशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दोनों राज्यों के बीच संवाद की नई कोशिश भी सामने आई है। कर्नाटक सरकार ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को कावेरी बेसिन का हवाई सर्वे करने का न्योता दिया है। प्रस्ताव यह है कि वह हेलीकॉप्टर से जलाशयों और कैचमेंट एरिया का दौरा करें और अपनी आंखों से देखें कि राज्य में पानी की वास्तविक स्थिति क्या है। यह पेशकश ऐसे समय आई है, जब कावेरी जल नियमन समिति (CWRC) ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु छोड़ने का निर्देश दिया है।
कर्नाटक का कहना है कि इस साल सामान्य से काफी कम बारिश हुई है और जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक है। ऐसे में राज्य के सामने पीने के पानी और सिंचाई दोनों की चुनौती खड़ी हो गई है। यही वजह है कि सरकार अब इस आदेश को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
‘पहले खुद देखिए, फिर फैसला लीजिए’
नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कर्नाटक सरकार की ओर से कहा गया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को कावेरी बेसिन की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष आकलन करना चाहिए। इसके लिए राज्य सरकार हेलीकॉप्टर की पूरी व्यवस्था करने को तैयार है।
सरकार का कहना है कि यदि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्वयं जलाशयों और कैचमेंट क्षेत्रों का निरीक्षण करेंगे, तो उन्हें यह समझने में आसानी होगी कि वर्तमान हालात में कर्नाटक किन परिस्थितियों का सामना कर रहा है। जानकारी के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच फोन पर भी बातचीत हुई है। साथ ही तमिलनाडु की ओर से कर्नाटक के मुख्य सचिव को प्रस्तावित दौरे को लेकर पत्र भी भेजा गया है। इस यात्रा के दौरान कावेरी जल विवाद पर दोनों राज्यों के बीच बातचीत भी होने की संभावना है।
CWRC के आदेश पर कानूनी लड़ाई की तैयारी
कर्नाटक सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह कावेरी जल नियमन समिति के आदेश को स्वीकार करने के बजाय उसके खिलाफ कानूनी विकल्प अपनाएगी। सरकार के मुताबिक, एडवोकेट जनरल, कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा के बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) में अपील दायर करने की तैयारी चल रही है।
सरकार का यह भी कहना है कि इसी वर्ष पहले दो मौकों पर तमिलनाडु की पानी छोड़ने की मांग को जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होने के आधार पर खारिज किया गया था। ऐसे में अब पानी की कमी के बावजूद पानी छोड़ने का निर्देश दिए जाने पर राज्य ने सवाल उठाए हैं।
कम बारिश बनी सबसे बड़ी चिंता, किसानों में बढ़ा विरोध
कर्नाटक सरकार का दावा है कि कावेरी बेसिन के चार प्रमुख जलाशयों में इस बार पानी का प्रवाह पिछले 30 वर्षों के औसत की तुलना में लगभग 66 प्रतिशत कम है। ऐसे में सबसे बड़ी प्राथमिकता राज्य के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराना और किसानों की सिंचाई जरूरतों को पूरा करना है।
इसी मुद्दे को लेकर मंड्या, मैसूर और कावेरी बेसिन के अन्य जिलों में किसानों और कई राजनीतिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि जब राज्य के भीतर ही पानी की कमी है, तब दूसरे राज्य को पानी छोड़ना स्थानीय किसानों के हितों के खिलाफ होगा।
सर्वदलीय बैठक भी होगी, केंद्र के मंत्री ने भी उठाए सवाल
कर्नाटक सरकार ने संकेत दिए हैं कि दिल्ली से लौटने के बाद बेंगलुरु में सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी। इस बैठक में आगे की रणनीति और कानूनी कदमों पर चर्चा की जाएगी, ताकि राज्य का पक्ष मजबूती से रखा जा सके।
इस बीच केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने भी CWRC के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने इस आदेश को “अवैज्ञानिक” बताते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में राज्य को सबसे पहले पीने के पानी और किसानों की जरूरतों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके अनुसार, पानी की उपलब्धता को देखते हुए ही आगे कोई फैसला होना चाहिए।
फिलहाल कावेरी जल विवाद एक बार फिर संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। अब सभी की नजर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के प्रस्तावित दौरे, दोनों राज्यों के बीच संभावित बातचीत और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण में होने वाली अगली कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई है।


