शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गरमाई बहस, कपिल सिब्बल बोले- विधायकों की बगावत से पार्टी बदल गई तो लोकतंत्र का क्या होगा?

शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गरमाई बहस, कपिल सिब्बल बोले- विधायकों की बगावत से पार्टी बदल गई तो लोकतंत्र का क्या होगा?

शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में लोकतंत्र और राजनीतिक दलों की संवैधानिक पहचान से जुड़े बड़े सवाल तक पहुंच गया है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में सवाल उठाया कि अगर किसी राजनीतिक दल का विधायी विंग यानी उसके विधायक अलग होकर खुद को पूरी पार्टी बताने लगे और इसके आधार पर नई सरकार बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर समस्या होगी। सिब्बल ने चेतावनी दी कि कानून की ऐसी व्याख्या राजनीतिक दलों को कमजोर कर सकती है और चुनी हुई सरकारों के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर सकती है।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है। यह सुनवाई उद्धव ठाकरे की उस याचिका से जुड़ी है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना माना गया और उसे ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई।

असली विवाद क्या है? विधायकों का गुट ही पूरी पार्टी कैसे?

सुनवाई के दौरान सबसे अहम सवाल यह रहा कि अगर किसी राजनीतिक दल के विधायक अलग हो जाते हैं, तो क्या इस टूट का असर मूल राजनीतिक संगठन पर भी माना जा सकता है?

उद्धव गुट का तर्क है कि शिवसेना में विवाद मुख्य रूप से विधायी दल के स्तर पर शुरू हुआ था। ऐसे में चुनाव आयोग को केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए था कि मूल राजनीतिक पार्टी भी विभाजित हो गई है। सिब्बल ने कहा कि चुनाव चिन्ह आदेश के पैराग्राफ 15 में ‘विधायी दल’ की अलग अवधारणा का उल्लेख नहीं है।

पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग को किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच नाम और चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद पर फैसला करने का अधिकार है। लेकिन उद्धव गुट का सवाल है कि क्या इस प्रावधान के जरिए विधायकों की संख्या के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि असली पार्टी कौन है?

कपिल सिब्बल ने 2018 के संविधान का भी उठाया मुद्दा

सिब्बल ने सुनवाई के दौरान शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे और 2018 के पार्टी संविधान का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि पार्टी ने अपने संविधान में हुए बदलाव की जानकारी चुनाव आयोग को दी थी। हालांकि आयोग ने माना कि यह संविधान उसके रिकॉर्ड में नहीं था।

सिब्बल के मुताबिक, उस समय राजनीतिक दलों के लिए संशोधित संविधान को चुनाव आयोग के पास जमा करना अनिवार्य नहीं था। इसके बावजूद शिवसेना की ओर से 2018 का संविधान आयोग को दिया गया था।

उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों की नियुक्ति और चुनाव के बीच भी अंतर बताया। उनका कहना था कि शिवसेना की सर्वोच्च नीति-निर्धारण व्यवस्था में पक्ष प्रमुख, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और 21 डिप्टी लीडर जैसे पद लोकतांत्रिक तरीके से चुने जाते हैं। कुछ अन्य पदों पर नियुक्तियां होती हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से संगठन के फैसलों को लागू करने का काम करते हैं।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने 2018 के संविधान को नजरअंदाज कर एक खास निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- विधायी टूट का असर संगठन तक पहुंचा या नहीं, यह देखना होगा

पीठ ने भी मामले के इस पहलू को महत्वपूर्ण माना। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने संकेत दिया कि चुनाव आयोग के तर्क की समीक्षा जरूरी हो सकती है, लेकिन केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि टूट विधायी दल में हुई थी।

उनका सवाल था कि क्या विधायी दल से शुरू हुआ विवाद आगे चलकर मूल राजनीतिक संगठन और उसके सदस्यों तक भी पहुंचा? यानी अदालत यह जांचना चाहती है कि क्या विधानसभा में हुआ विभाजन पार्टी के जमीनी संगठन में भी वास्तविक विभाजन के रूप में दिखाई दिया था।

जस्टिस बागची ने संविधान पीठ के Subhash Desai फैसले का भी संदर्भ दिया। उनके अनुसार, उस फैसले में यह कहा गया था कि पार्टी में विभाजन का परीक्षण केवल विधायी दल तक सीमित नहीं किया जा सकता। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि विधायी दल में शुरू हुई टूट, अगर संगठन और प्राथमिक सदस्यता में भी दिखाई दे, तो उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि शुरुआत में ही चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को खत्म मान लेना सही नहीं होगा। अगर आयोग ने अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया या उसका तरीका गलत था, तो वह अलग सवाल है।

सिब्बल की बड़ी चिंता- ऐसा हुआ तो चुनी हुई सरकारें गिराने का रास्ता खुल सकता है?

सुनवाई के अंत में बहस ने संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े बड़े सवाल का रूप ले लिया। सिब्बल ने कहा कि अगर विधायी दल के एक हिस्से के अलग होने को ही पार्टी की पहचान बदलने का आधार मान लिया जाए, तो इसका इस्तेमाल भविष्य में किसी भी सरकार को गिराने के लिए किया जा सकता है।

उन्होंने अदालत के सामने चिंता जताई कि किसी पार्टी का विधायी विंग अलग हो, खुद को मूल पार्टी बताए और फिर चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करे, तो इससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।

सिब्बल ने यह भी कहा कि एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद उद्धव गुट के कई लोग धीरे-धीरे उनके साथ चले गए और ऐसी राजनीतिक घटनाएं आगे भी जारी रहीं। उनके मुताबिक, बाद की घटनाओं को आधार बनाकर शुरुआती स्थिति का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।

उद्धव गुट का कहना है कि जब शिंदे गुट ने 19 जुलाई 2022 को चुनाव चिन्ह के लिए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया था, उस तारीख को आयोग के सामने ऐसा पर्याप्त आधार नहीं था जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पूरी राजनीतिक पार्टी में विभाजन हो चुका है।

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल सवाल यही है कि किसी पार्टी की वास्तविक पहचान तय करने में विधायकों की संख्या, संगठनात्मक ढांचा, पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और घटनाक्रम में से किन पहलुओं को कितना महत्व दिया जाए। इस मामले का फैसला केवल शिवसेना विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक दलों में टूट और उनके चुनाव चिन्ह से जुड़े विवादों की संवैधानिक समझ के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी। अदालत अब प्रतिवादी पक्ष की दलीलें सुनने के बाद इन संवैधानिक सवालों पर आगे विचार करेगी।