अगर किसी वसीयत (Will) को अदालत में साबित करना है, तो सिर्फ यह कह देना कि गवाह अब जीवित नहीं हैं, पर्याप्त नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 69 का सहारा तभी लिया जा सकता है, जब यह ठोस तरीके से साबित किया जाए कि वसीयत के सभी गवाह उपलब्ध नहीं हैं या उन्हें अदालत में पेश करना संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि धारा 68 में तय कानूनी प्रक्रिया को बिना उचित आधार के दरकिनार नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट के विभाजन संबंधी आदेश को बहाल कर दिया। यह फैसला वसीयत से जुड़े मामलों में सबूतों के मानकों और गवाहों की भूमिका को लेकर भविष्य के मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पारिवारिक संपत्ति विवाद से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
यह विवाद तमिलनाडु के एक परिवार की पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। संपत्ति मूल रूप से वैयापुरी गौंडर की थी, जिनकी मृत्यु लगभग 1925 में हुई थी। उनकी तीसरी पत्नी अरुक्कानीअम्मल के निधन के बाद उनकी उत्तराधिकार संपत्ति को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
अपीलकर्ताओं का कहना था कि अरुक्कानीअम्मल ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी, इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(b) के अनुसार संपत्ति पति के कानूनी उत्तराधिकारियों में बंटनी चाहिए।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने 15 दिसंबर 1976 की एक पंजीकृत वसीयत पेश करते हुए दावा किया कि अरुक्कानीअम्मल ने कृषि भूमि उनके पक्ष में कर दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने वसीयत को संदिग्ध मानते हुए उसे कानूनी रूप से साबित नहीं माना और अपीलकर्ताओं को दो-तिहाई हिस्से का अधिकार दिया। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने धारा 69 का सहारा लेकर वसीयत को स्वीकार कर लिया, जिसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
धारा 69 कब लागू होगी? कोर्ट ने साफ किया नियम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 69 कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है, जिसे पक्षकार अपनी सुविधा से चुन सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले यह साबित करना जरूरी है कि वसीयत के किसी भी गवाह को अदालत में बुलाना संभव नहीं है। इस मामले में एक गवाह मारप्पा गौंडर की मृत्यु का प्रमाण उनके बेटे की गवाही से सामने आया था, लेकिन दूसरे गवाह अवनाशी गौंडर के बारे में कोई विश्वसनीय प्रमाण पेश नहीं किया गया।
न तो उनकी मृत्यु का रिकॉर्ड दिया गया, न परिवार के किसी सदस्य की गवाही आई और न ही गांव के दस्तावेज पेश किए गए। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 69 लागू करने की बुनियादी शर्त ही पूरी नहीं हुई थी।
लेखक और गवाह में क्या अंतर है?
मामले की सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आया कि क्या वसीयत लिखने वाला व्यक्ति खुद गवाह माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल दस्तावेज लिख देना किसी व्यक्ति को गवाह नहीं बना देता। गवाह बनने के लिए यह साबित होना चाहिए कि उसने वसीयत पर हस्ताक्षर इस उद्देश्य से किए थे कि वह उसके निष्पादन का साक्षी बने।
इस मामले में दस्तावेज लिखने वाले व्यक्ति ने खुद स्वीकार किया कि उसने केवल लेखक के रूप में हस्ताक्षर किए थे। इसलिए अदालत ने उसे गवाह मानने से इनकार कर दिया।
अदालत को वसीयत में दिखीं कई संदिग्ध परिस्थितियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस वसीयत के आसपास कई ऐसे तथ्य थे, जिनका संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
अदालत ने पाया कि वसीयत में संपत्ति को स्वयं अर्जित बताया गया था, जबकि वह पति से मिली हुई संपत्ति थी। इसमें सौतेली बेटी को अपनी बेटी और उसके बेटों को अपने पोते बताया गया था, जबकि उनके वास्तविक संबंध अलग थे।
इसके अलावा अन्य प्राकृतिक उत्तराधिकारियों को पूरी तरह बाहर रखा गया था। एक गवाह लाभार्थी परिवार से जुड़ा हुआ था, दूसरा दूसरे गांव का निवासी था और वसीयत की मूल प्रति लंबे समय तक किसके पास रही, इसका भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि लाभार्थी पक्ष की महत्वपूर्ण सदस्य को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया, जबकि वह ऐसा कर सकती थीं।
आखिर क्या रहा सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वसीयत कानून के अनुसार साबित नहीं हो सकी। इसलिए अरुक्कानीअम्मल को बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त माना गया।
इसके साथ ही अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया। फैसले के अनुसार अपीलकर्ताओं को ए और बी शेड्यूल की संपत्तियों में सामूहिक रूप से दो-तिहाई हिस्से का अधिकार मिलेगा, जबकि प्रतिवादियों की स्थायी निषेधाज्ञा की मांग खारिज कर दी गई।
यह फैसला उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां वसीयत को साबित करने के लिए गवाहों की उपलब्धता और कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत से जुड़े मामलों में तय कानूनी मानकों का पालन करना अनिवार्य है और उन्हें केवल दावों के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

