इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 40 साल पुराने हत्या मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जो आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की अहमियत को फिर से रेखांकित करता है। अदालत ने साफ कहा कि केवल किसी व्यक्ति का नाम FIR में दर्ज होना, बिना ठोस साक्ष्य और उसकी स्पष्ट भूमिका साबित हुए, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता। इसी सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने नागेंद्र और जुगेंद्र नाम के दो आरोपियों को बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उनकी सजा को रद्द कर दिया।
यह मामला उन मामलों में शामिल है, जहां अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही टिक सकती है।
चार दशक पुराने मामले में क्या था पूरा विवाद?
अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता पक्ष और आरोपियों के बीच पहले से मुकदमेबाजी को लेकर पुरानी रंजिश थी। आरोप था कि घटना वाले दिन कुछ लोग लाठी, भाला, फावड़ा और गंडासा जैसे हथियार लेकर एक घर के पास पहुंचे और ओमपाल सिंह पर हमला कर दिया। हमले में उनकी मौत हो गई, जबकि उन्हें बचाने पहुंचे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भी मारपीट की गई।
इस मामले में कुल आठ लोगों को IPC की धाराओं 147, 148, 302/149, 325/149 और 323/149 के तहत दोषी ठहराया गया था। हालांकि, अपील की सुनवाई लंबी चलने के दौरान छह आरोपियों की मौत हो गई। आखिरकार हाईकोर्ट के सामने केवल नागेंद्र और जुगेंद्र की अपील बची, जिस पर अब फैसला आया है।
कोर्ट ने क्यों कहा- FIR में नाम होना काफी नहीं
जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्र की पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि FIR में दोनों आरोपियों के नाम जरूर दर्ज थे, लेकिन उनके हिस्से की कोई स्पष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी। यह भी उल्लेख नहीं था कि उनके पास कौन-सा हथियार था या उन्होंने हमला किस तरह किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने गवाहों की गवाही को भी महत्वपूर्ण माना। पांच तथ्यात्मक गवाहों में से केवल सूचनाकर्ता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया, जबकि बाकी गवाह पक्षद्रोही हो गए। घायल गवाह भी यह नहीं बता सका कि किस आरोपी के पास कौन-सा हथियार था और किसने उस पर हमला किया।
इतना ही नहीं, मृतक की पत्नी और अन्य कथित घायल गवाह भी हमलावरों की स्पष्ट पहचान नहीं कर सके। ऐसे में अदालत ने कहा कि केवल FIR में नाम होने से किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि स्वतः स्थापित नहीं हो जाती।
धारा 149 IPC पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धारा 149 IPC को लेकर अदालत की टिप्पणी रही। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को सामूहिक या परोक्ष आपराधिक दायित्व के तहत दोषी ठहराने से पहले यह साबित करना जरूरी है कि धारा 141 IPC के तहत वास्तव में कोई गैरकानूनी सभा मौजूद थी, आरोपी उसका सदस्य था और उसने उस सभा के साझा उद्देश्य (Common Object) को स्वीकार किया था या उसकी जानकारी रखता था।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Kuldip Yadav बनाम State of Bihar और Ramachandran बनाम State of Kerala मामलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी समूह के साथ घटनास्थल पर मौजूद होना मात्र पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि कथित गैरकानूनी सभा कब बनी, कहां बनी और उसका साझा उद्देश्य क्या था।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य नागेंद्र और जुगेंद्र की कथित गैरकानूनी सभा में भागीदारी और साझा उद्देश्य को संतोषजनक रूप से साबित नहीं करते। इसलिए उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखना कानून के अनुरूप नहीं होगा।
अदालत ने दोनों आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी तथा उन्हें बरी करने का आदेश दिया।


