देश में आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जातिगत आरक्षण की समीक्षा और आर्थिक आधार पर सरकारी सहायता की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि समीक्षा और सुधार के नाम पर आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या आरक्षण की समीक्षा हो सकती है, क्या सुप्रीम कोर्ट इसे खत्म कर सकता है और संविधान इस विषय पर क्या कहता है?
इन सवालों का जवाब कानून और संविधान दोनों में मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि आरक्षण को पूरी तरह खत्म करना अदालत का अधिकार नहीं है। हालांकि, उसके लागू होने के तरीके, संवैधानिक वैधता और कुछ परिस्थितियों में उससे जुड़े आंकड़ों की समीक्षा न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? 2022 का फैसला क्यों अहम है
आरक्षण पर सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणियों में से एक 28 जनवरी 2022 को जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में सामने आई। जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बी.आर. गवई की पीठ ने साफ कहा कि आरक्षण को पूरी तरह जारी रखना या समाप्त करना विधायिका और कार्यपालिका का विषय है, न कि न्यायपालिका का।
इसका मतलब यह है कि अदालत यह जांच सकती है कि आरक्षण संविधान के अनुरूप लागू हो रहा है या नहीं, लेकिन देश में आरक्षण रहेगा या खत्म होगा, इसका अंतिम फैसला संसद और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
बाद में 2024 में स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह मामले में संविधान पीठ ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर उप-वर्गीकरण को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया। साथ ही कहा कि इसके लिए राज्य को पर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़े ठोस और अनुभवजन्य आंकड़े पेश करने होंगे।
आरक्षण का उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं, प्रतिनिधित्व बढ़ाना है
आरक्षण को अक्सर गरीबी उन्मूलन योजना समझ लिया जाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण इससे अलग है। इंदिरा साहनी जैसे ऐतिहासिक फैसलों में अदालत स्पष्ट कर चुकी है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन सामाजिक वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना है जिन्हें ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, प्रशासन और सत्ता के केंद्रों से दूर रखा गया।
यही वजह है कि संविधान इसे समानता के सिद्धांत का अपवाद नहीं, बल्कि वास्तविक समान अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम मानता है।
संविधान में आरक्षण के कौन-कौन से प्रावधान हैं?
भारतीय संविधान में आरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।
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अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में विशेष प्रावधान करने का अधिकार देते हैं।
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अनुच्छेद 330 और 332 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षित सीटों का आधार हैं।
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अनुच्छेद 335 प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखते हुए SC/ST के दावों पर विचार करने की बात करता है।
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2019 के 103वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जोड़ा गया।
इन प्रावधानों से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए संविधान ने कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की है। इसलिए केवल यह कहना कि संविधान लागू हुए कई दशक हो गए, इस आधार पर आरक्षण स्वतः समाप्त नहीं हो सकता।
समीक्षा का असली मतलब क्या है और आगे बहस किस पर है?
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के फैसले में यह जरूर कहा कि विशेष रूप से पदोन्नति में आरक्षण जैसे मामलों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आधार बनने वाले आंकड़ों की समय-समय पर समीक्षा जरूरी हो सकती है। यानी अदालत का जोर यह सुनिश्चित करने पर है कि जिन आधारों पर आरक्षण लागू किया गया था, वे तथ्यात्मक रूप से अभी भी मौजूद हैं या नहीं।
यही वजह है कि आज बहस केवल “आरक्षण रहे या न रहे” तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि किन वर्गों को कितना प्रतिनिधित्व मिला, कौन से समुदाय अब भी पीछे हैं और क्या मौजूदा व्यवस्था के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं।
केंद्र सरकार के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 80 मंत्रालयों और विभागों से प्राप्त जानकारी में केंद्रीय कर्मचारियों में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 16.84 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति की 8.70 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की 26.32 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं ग्रुप A सेवाओं में SC की हिस्सेदारी 14.20 प्रतिशत, ST की 6.54 प्रतिशत और OBC की 19.14 प्रतिशत रही।
ये आंकड़े बताते हैं कि आरक्षण पर चर्चा केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक फैसलों और वास्तविक प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ती है। यही कारण है कि आरक्षण की समीक्षा पर होने वाली हर बहस में संविधान और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका केंद्र में बनी रहती है।


