उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन महिलाओं को लेकर सियासी दांव-पेच तेज हो चुके हैं। समाजवादी पार्टी ने महिला सम्मान समृद्धि योजना के तहत सत्ता में आने पर महिलाओं को हर साल ₹40 हजार देने का वादा किया है। वहीं योगी सरकार छात्राओं के लिए स्कूटी और महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा जैसी योजनाओं के जरिए अपना फोकस दिखा रही है। लेकिन इन तमाम घोषणाओं के बीच एक सवाल अब ज्यादा अहम हो गया है—महिलाओं के लिए योजनाएं तो खूब हैं, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए टिकट कितने मिलेंगे?
पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े देखें तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन टिकट बंटवारे में बीजेपी और सपा समेत ज्यादातर दल अब भी बड़ी संख्या में सीटें महिलाओं को देने से बचते रहे हैं।
चुनावी राजनीति में महिला वोटर सबसे बड़ा फैक्टर, लेकिन टिकट पर तस्वीर अलग
उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता अब किसी भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हैं। पिछले कुछ लोकसभा चुनावों और अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों में महिला वोटरों की भूमिका पर लगातार चर्चा हुई है। यही वजह है कि राजनीतिक दल महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाएं और घोषणाएं कर रहे हैं।
सपा ने महिला समानता दिवस पर स्त्री सम्मान समृद्धि योजना का ऐलान किया। पार्टी ने कहा कि सरकार बनने पर महिलाओं को हर साल ₹40 हजार की आर्थिक मदद दी जाएगी और आगे इस राशि को बढ़ाया भी जाएगा।
दूसरी तरफ योगी सरकार ने भी महिलाओं और बेटियों से जुड़े कई ऐलान किए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि स्नातक की पढ़ाई करने वाली 50 हजार छात्राओं को अक्टूबर-नवंबर में स्कूटी दी जाएगी। रक्षाबंधन के मौके पर 27, 28 और 29 अगस्त को महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा की घोषणा भी की गई। इसके अलावा 60 साल से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना के तहत निशुल्क बस यात्रा की बात कही गई।
यानी महिला वोटर तक पहुंचने की कोशिश दोनों तरफ से साफ दिखाई दे रही है।
2022 में 559 महिलाओं ने लड़ा चुनाव, लेकिन जीत मिली सिर्फ 47 को
अब टिकट और चुनावी प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर नजर डालें। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुल 4,442 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें 559 महिलाएं थीं। यानी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी रही।
हालांकि, 2017 के मुकाबले यह आंकड़ा करीब 4 फीसदी बढ़ा था। लेकिन टिकट वितरण में प्रमुख दलों की तस्वीर बहुत मजबूत नहीं थी।
कांग्रेस ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के तहत सबसे ज्यादा 155 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया। बीजेपी ने 45 और समाजवादी पार्टी ने 42 महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा। मायावती की बसपा ने 38 महिलाओं को टिकट दिया।
इन 559 महिला उम्मीदवारों में से शुरुआत में 44 महिलाएं विधायक बनीं। बाद में उपचुनावों के बाद यह संख्या 47 तक पहुंची। बीजेपी की 29 महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। सपा की 14 महिलाएं चुनाव जीतीं। कांग्रेस को सिर्फ एक महिला सीट मिली। अपना दल (सोनेलाल) की तीन महिला उम्मीदवार भी विधानसभा पहुंचीं।
यानी टिकट देने और चुनाव जिताने, दोनों स्तरों पर पार्टियों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
2017 में बीजेपी आगे, सपा पीछे; 2012 में भी आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं था
2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 485 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं। बीजेपी ने सबसे ज्यादा 44 महिलाओं को टिकट दिया था। समाजवादी पार्टी ने 22, बसपा ने 20 और कांग्रेस ने 11 महिला उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया।
इनमें से 41 महिलाएं जीतकर विधानसभा पहुंचीं। बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल की कुल 36 महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। बसपा और कांग्रेस की दो-दो तथा सपा की एक महिला उम्मीदवार चुनाव जीती। बाद में उपचुनावों से तीन और सीटें महिलाओं के खाते में गईं।
इससे पहले 2012 में भी स्थिति बहुत अलग नहीं थी। उस चुनाव में 6,839 उम्मीदवारों में सिर्फ 583 महिलाएं थीं। यानी महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी करीब 8.5 फीसदी रही।
उस समय बीजेपी ने 44 महिलाओं को टिकट दिया था। सपा ने 33 महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा। राष्ट्रीय लोक दल ने 25, बसपा ने 19 और कांग्रेस ने 11 महिलाओं को टिकट दिया। कुल 583 महिला उम्मीदवारों में से 35 चुनाव जीतकर विधायक बनी थीं।
2027 में असली परीक्षा योजनाओं की नहीं, टिकट बंटवारे की होगी
इन तीन चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि यूपी की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ी है, लेकिन यह बढ़ोतरी अभी भी सीमित है। 2012 में जहां 583 महिलाएं चुनाव लड़ी थीं, वहीं 2022 में यह संख्या 559 रही। यानी उम्मीदवारों की कुल संख्या के अनुपात में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की चुनौती अभी बनी हुई है।
यही वजह है कि 2027 का चुनाव सिर्फ महिला केंद्रित योजनाओं के लिहाज से नहीं, बल्कि टिकट वितरण के मामले में भी महत्वपूर्ण होगा।
महिलाओं को आर्थिक सहायता, मुफ्त यात्रा, स्कूटी और दूसरी सुविधाओं के वादे चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल इससे अलग है। महिला वोटर अगर चुनावी जीत का महत्वपूर्ण आधार हैं, तो सवाल यह भी रहेगा कि राजनीतिक दल उन्हें निर्णय लेने और चुनाव लड़ने की प्रक्रिया में कितनी जगह देते हैं।
अब नजर बीजेपी, सपा और दूसरे दलों की अगली सूची पर होगी। असली तस्वीर तभी सामने आएगी कि 2027 में ‘महिला सम्मान’ का राजनीतिक संदेश सिर्फ योजनाओं तक सीमित रहता है या टिकट बंटवारे में भी उसका असर दिखाई देता है।

