कांग्रेस के गढ़ों में CM मोहन यादव का ‘जनविश्वास’ दांव! 2028 से पहले 20 सीटों पर बीजेपी की नजर, जानें पूरा प्लान

कांग्रेस के गढ़ों में CM मोहन यादव का ‘जनविश्वास’ दांव! 2028 से पहले 20 सीटों पर बीजेपी की नजर, जानें पूरा प्लान

मध्य प्रदेश में 2028 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन बीजेपी ने उन इलाकों पर काम शुरू कर दिया है जहां 2023 में कांग्रेस का प्रदर्शन उससे बेहतर रहा था। मुख्यमंत्री मोहन यादव का ‘जनविश्वास अभियान’ इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। 7 अगस्त को छिंदवाड़ा से शुरू हुआ अभियान बड़वानी और टीकमगढ़ होते हुए अब बालाघाट पहुंच रहा है। खास बात यह है कि इन चार जिलों की 20 विधानसभा सीटों में फिलहाल कांग्रेस का पलड़ा भारी है। उपचुनाव के बाद कांग्रेस के पास 15 और बीजेपी के पास सिर्फ 5 सीटें हैं। ऐसे में 2028 से पहले मुख्यमंत्री का इन क्षेत्रों में सीधे जनता से संवाद करना राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है।

छिंदवाड़ा से बालाघाट तक क्यों चुना गया यही रास्ता?

‘जनविश्वास अभियान’ की शुरुआत मुख्यमंत्री ने 7 अगस्त को छिंदवाड़ा से की थी। इसके बाद बड़वानी और टीकमगढ़ में जनता से संवाद हुआ। रक्षाबंधन के कारण शुक्रवार का कार्यक्रम शनिवार को किया जा रहा है और अब मुख्यमंत्री बालाघाट में लोगों से सीधे बातचीत करेंगे।

इन चार जिलों को महज प्रशासनिक दौरे के तौर पर देखना आसान नहीं है। 2023 के विधानसभा चुनाव में इन इलाकों में कांग्रेस का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर रहा था। इसलिए मुख्यमंत्री का लगातार इन क्षेत्रों में जाना सरकार के कामकाज का फीडबैक लेने के साथ-साथ बीजेपी के कमजोर चुनावी क्षेत्रों में संगठन और जनसंपर्क मजबूत करने की कोशिश भी माना जा रहा है।

खासकर आदिवासी बहुल इलाकों पर बीजेपी की नजर है। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 22 फीसदी बताई गई है और विधानसभा की 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। जनविश्वास अभियान के चार जिलों में छिंदवाड़ा, बड़वानी और बालाघाट आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं।

20 सीटों का गणित कांग्रेस के पक्ष में, बीजेपी क्यों बेचैन?

2023 के चुनावी नतीजों को देखें तो इन चार जिलों की 20 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था। छिंदवाड़ा जिले में पांढुर्णा को शामिल करने पर सभी 7 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। हालांकि बाद में अमरवाड़ा सीट के उपचुनाव में बीजेपी ने जीत दर्ज कर ली।

बालाघाट की 6 सीटों में कांग्रेस ने 4 और बीजेपी ने 2 सीटें जीती थीं। बड़वानी की 4 सीटों में कांग्रेस के खाते में 3 और बीजेपी के पास 1 सीट आई। टीकमगढ़ की 3 सीटों में कांग्रेस ने 2 और बीजेपी ने 1 सीट जीती।

इस तरह उपचुनाव के बाद इन चार जिलों की 20 सीटों में कांग्रेस के पास 15 और बीजेपी के पास 5 सीटें हैं। यही आंकड़ा बताता है कि 2028 की तैयारी में इन इलाकों को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।

आदिवासी वोट बैंक पर क्यों बढ़ा फोकस?

बीजेपी के लिए आदिवासी क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावों में इन इलाकों में मुकाबला कड़ा रहा। 2023 में इन क्षेत्रों में बीजेपी ने 24 आदिवासी सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 22 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही। सैलाना सीट भारत आदिवासी पार्टी के खाते में गई।

इससे पहले 2018 में तस्वीर कांग्रेस के पक्ष में काफी मजबूत थी। कांग्रेस ने 30 आदिवासी सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी 16 पर सिमट गई थी। नतीजे ऐसे रहे कि बीजेपी को सत्ता गंवानी पड़ी। 2013 में बीजेपी के पास इन वर्ग के लिए आरक्षित 31 सीटें थीं।

यानी आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी सीटों का रुख मध्य प्रदेश की सत्ता के समीकरण पर सीधा असर डाल सकता है। यही कारण है कि बीजेपी 2028 से काफी पहले इस वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

जनविश्वास अभियान में एक्शन भी, सियासत भी

मुख्यमंत्री के दौरे केवल भाषण और जनता से संवाद तक सीमित नहीं रहे। छिंदवाड़ा में अभियान की शुरुआत के दौरान शिकायतों और अधिकारियों के कामकाज को लेकर सख्ती दिखाई गई। पहले ही दिन CMHO और तहसीलदार समेत तीन अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई।

टीकमगढ़ में जिला पंजीयक सहकारिता को निलंबित किया गया। इसके साथ ही कुंडेश्वर धाम को ‘कुंडेश्वर लोक’ के रूप में विकसित करने की घोषणा हुई।

बड़वानी में भी कार्रवाई का सिलसिला देखने को मिला। वहां तहसीलदार, दो CMHO समेत सात अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।

सरकार के नजरिए से यह अभियान प्रशासनिक जवाबदेही और जनता की शिकायतों पर सीधे कार्रवाई का संदेश देता है। लेकिन राजनीतिक नजर से देखें तो इसका एक दूसरा पहलू भी है। जिन इलाकों में कांग्रेस मजबूत रही है, वहां मुख्यमंत्री का सीधे लोगों के बीच जाना बीजेपी के ग्राउंड कनेक्ट को मजबूत करने की कोशिश माना जा रहा है।

अब असली सवाल यही है कि क्या यह जनसंपर्क 2028 तक राजनीतिक समर्थन में बदल पाएगा? क्या कांग्रेस के मजबूत इलाकों में बीजेपी अपनी स्थिति सुधार सकेगी? और क्या आदिवासी बेल्ट में जनविश्वास अभियान सत्ता के अगले चुनावी मुकाबले का समीकरण बदलने में कामयाब होगा? इन सवालों का जवाब आने वाले महीनों में जनता के रुख से मिलेगा।