हरियाणा विधानसभा के मानसून सत्र में मंगलवार को उस समय राजनीतिक माहौल अचानक गरमा गया, जब ‘संत गुरु रविदास जी महाराज समरसता संकल्प अभियान’ से जुड़े एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री गीता भुक्कल की एक टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते सदन में तीखी बहस, नारेबाजी और विरोध शुरू हो गया, जिसके कारण कार्यवाही भी कुछ समय के लिए प्रभावित हुई।
मामला एक ऐसे बयान से जुड़ा था, जिसे भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने ब्राह्मण समाज का अपमान बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। वहीं कांग्रेस की ओर से भी अपने पक्ष को रखने की कोशिश की गई। विवाद इतना बढ़ा कि अंततः स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा और सदन की कार्यवाही से संबंधित टिप्पणियों को हटाने का आदेश देना पड़ा।
समरसता पर चर्चा के बीच कैसे शुरू हुआ विवाद?
विधानसभा में ‘संत गुरु रविदास जी महाराज समरसता संकल्प अभियान’ पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान गीता भुक्कल ने अपने संबोधन में एक प्रसिद्ध पंक्ति का उल्लेख किया। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति का सम्मान उसके गुणों और व्यवहार के आधार पर होना चाहिए, केवल किसी जातीय पहचान के आधार पर नहीं।
अपने भाषण के दौरान उन्होंने बीजेपी विधायक रामकुमार गौतम का भी जिक्र किया और उन पर समाज में जातीय विभाजन बढ़ाने के आरोप लगाए। भुक्कल की इस टिप्पणी के बाद सत्ता पक्ष के सदस्य अपनी सीटों से खड़े हो गए और उन्होंने कड़ा विरोध दर्ज कराया।
कुछ ही मिनटों में सदन का माहौल पूरी तरह बदल गया। चर्चा का केंद्र समरसता अभियान से हटकर बयान पर आ गया।
बीजेपी ने कहा- पूरे समाज का अपमान
सत्ताधारी भाजपा के विधायकों ने गीता भुक्कल के बयान को गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि यह केवल किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे ब्राह्मण समुदाय से जुड़ा मामला है।
बीजेपी सदस्यों ने मांग की कि कांग्रेस विधायक अपना बयान तत्काल वापस लें और सार्वजनिक रूप से माफी मांगें। सत्ता पक्ष के कई विधायक लगातार विरोध जताते रहे। उनका कहना था कि विधानसभा जैसे लोकतांत्रिक मंच पर किसी भी समुदाय के बारे में ऐसी टिप्पणी स्वीकार नहीं की जा सकती।
इसी मांग को लेकर सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। कई बार स्थिति ऐसी बनी कि कार्यवाही को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया।
नारेबाजी और तीखी बहस से बाधित हुई कार्यवाही
विवाद बढ़ने के साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों पर कायम रहे। एक तरफ भाजपा विधायक माफी की मांग कर रहे थे, तो दूसरी ओर विपक्ष अपनी बात रख रहा था।
सदन के भीतर लगातार शोर-शराबा और नारेबाजी होती रही। इसकी वजह से समरसता संकल्प अभियान पर चल रही चर्चा भी प्रभावित हुई। कुछ समय तक पूरा ध्यान उसी विवाद पर केंद्रित रहा।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, विधानसभा के भीतर इस तरह के विवाद अक्सर व्यापक राजनीतिक संदेश भी देते हैं, क्योंकि सदन में कही गई बातें सीधे जनता तक पहुंचती हैं और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच चर्चा का विषय बन जाती हैं।
माफी और स्पीकर के हस्तक्षेप के बाद शांत हुआ मामला
जब विवाद लगातार बढ़ता गया, तब कांग्रेस विधायक अशोक अरोड़ा ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर खेद व्यक्त किया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष हरविंदर कल्याण ने हस्तक्षेप करते हुए संबंधित टिप्पणियों को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया।
स्पीकर के आदेश और माफी के बाद सदन का माहौल धीरे-धीरे सामान्य हुआ और आगे की कार्यवाही जारी रखी गई। इसके साथ ही दिनभर चर्चा में रहा यह विवाद फिलहाल शांत होता दिखाई दिया।
हालांकि, इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विधानसभा जैसे मंचों पर राजनीतिक बहस और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। क्योंकि सदन में दिए गए बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका असर समाज और जनभावनाओं पर भी पड़ता है।



