दालों की कीमतों को लेकर आने वाले दिनों में भारतीय बाजार के लिए चिंता बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई प्रमुख दालों के भाव मजबूत हुए हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात पर निर्भर बाजारों की लागत पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, देश में कमजोर मानसून के कारण घरेलू उत्पादन प्रभावित होने की आशंका भी बाजार के समीकरण को बदल रही है। यानी एक तरफ विदेश से दाल मंगाना महंगा हो रहा है और दूसरी तरफ घरेलू उपलब्धता को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में अगर वैश्विक कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो इसका दबाव आगे चलकर भारतीय बाजार में भी दिखाई दे सकता है।
आईग्रेन इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, ब्राजील से भारत आने वाली ग्रेड-1 उड़द की कीमत 960 डॉलर प्रति टन हो गई है। पिछले स्तर 950 डॉलर प्रति टन के मुकाबले इसमें करीब 1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं म्यांमार एसक्यू उड़द का भारत के लिए भाव 965 डॉलर प्रति टन दर्ज किया गया है।
ऑस्ट्रेलिया से म्यांमार तक बढ़ी दालों की कीमत
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी सिर्फ उड़द तक सीमित नहीं है। अलग-अलग देशों से आने वाली दालों के भाव में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है।
ऑस्ट्रेलियाई चने की कीमत बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के लिए 25 डॉलर प्रति टन बढ़ी है। ऑस्ट्रेलिया से भारत के लिए चने का भाव अब 685 डॉलर प्रति टन बताया गया है।
इसी तरह तंजानिया से पाकिस्तान के लिए दाल का भाव करीब 9 फीसदी बढ़कर 700 डॉलर प्रति टन पहुंच गया है। मोजांबिक की गजरा तुअर की कीमत भी भारत के लिए 7 फीसदी बढ़ी है और यह 760 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है।
मलाविया रेड तुअर का भाव 675 डॉलर प्रति टन दर्ज किया गया है। वहीं म्यांमार की लेमन-टाइप तुअर की कीमत 3 फीसदी बढ़कर 895 डॉलर प्रति टन हो गई है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि आयात करने वाले देशों के लिए दालों की लागत कई मोर्चों पर बढ़ रही है।
कनाडा की पीली मटर भी हुई महंगी
दालों और दलहन के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कनाडा का भी अहम हिस्सा है। यहां से भारत के लिए आने वाली पीली मटर का भाव 2 फीसदी बढ़कर 425 डॉलर प्रति टन हो गया है।
बांग्लादेश के लिए कनाडाई मटर की कीमत में इससे भी ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहां भाव 5 फीसदी बढ़कर 485 डॉलर प्रति टन पहुंच गया है।
भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाजार के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में इस तरह का बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आयात लागत बढ़ने पर घरेलू बाजार में भी कीमतों पर दबाव बन सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर घरेलू बाजार में कितना और कब दिखाई देगा, यह उपलब्धता, स्थानीय कीमतों और आगे के अंतरराष्ट्रीय भाव पर निर्भर करेगा।
कमजोर मानसून ने बढ़ाई चिंता, घरेलू बाजार पर नजर
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के साथ देश के भीतर कमजोर मानसून के कारण उत्पादन घटने की आशंका भी बाजार की चिंता बढ़ा रही है। अगर घरेलू पैदावार उम्मीद के मुताबिक नहीं रहती और दूसरी तरफ आयात महंगा होता है, तो बाजार में उपलब्धता पर दबाव बन सकता है।
दालें आम भारतीय परिवार की रोजमर्रा की खाद्य जरूरत का हिस्सा हैं। इसलिए कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए, जहां दालों की खपत नियमित और अधिक है।
फिलहाल बाजार में सबसे महत्वपूर्ण संकेत अंतरराष्ट्रीय भाव से मिल रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना होगा कि विदेशों में कीमतों की तेजी कितनी लंबी रहती है और घरेलू उत्पादन की स्थिति कैसी रहती है।
चावल के निर्यात भाव भी एक साल के उच्चतम स्तर पर
दलहन के अलावा भारतीय चावल के निर्यात बाजार से भी तेजी का संकेत मिला है। इस सप्ताह भारतीय चावल के निर्यात भाव एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए।
5 फीसदी टूटे पारबॉइल्ड चावल की कीमत पिछले सप्ताह के 369-375 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 371-377 डॉलर प्रति टन हो गई। वहीं 5 फीसदी टूटे सफेद चावल का भाव 368-373 डॉलर प्रति टन दर्ज किया गया।
इस तरह दालों के साथ चावल के निर्यात भाव में भी मजबूती दिखाई दे रही है। कमोडिटी बाजार के लिए यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर आयात लागत, घरेलू उपलब्धता और खाद्य कीमतों के समीकरण पर पड़ सकता है।
फिलहाल दालों के बाजार में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों की यह तेजी आगे कितनी टिकती है। अगर विदेशी बाजार में भाव ऊंचे बने रहते हैं और घरेलू उत्पादन पर भी दबाव आता है, तो भारतीय बाजार में दालों की कीमतों पर बढ़ता दबाव आम उपभोक्ता के लिए चिंता का विषय बन सकता है।



