स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में जेल में रहते हुए छह साल पूरे हो गए हैं। वह अभी भी मुकदमे की शुरुआत का इंतजार कर रहे हैं। इसी बीच वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने उनकी हिरासत और असहमति की आवाज को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखता है, तो उसके लिए ‘उमर खालिद को रिहा करो’ कहना पूरी तरह जायज है। ग्रोवर का तर्क है कि किसी व्यक्ति को उसके विचारों और राजनीतिक सक्रियता के कारण लंबे समय तक ट्रायल से पहले जेल में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।
छह साल से जेल, लेकिन ट्रायल अभी शुरू नहीं हुआ
वृंदा ग्रोवर ने यह बात एक ऑनलाइन बैठक के दौरान कही। यह बैठक उमर खालिद के UAPA के तहत अंडर-ट्रायल कैदी के रूप में जेल में छह साल पूरे होने के मौके पर आयोजित की गई थी।
ग्रोवर ने कहा कि खालिद की गिरफ्तारी को केवल एक सामान्य आपराधिक मामले की तरह नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक, खालिद को अपनी नागरिकता का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करने, अपने विचार रखने और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण निशाना बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि चार्जशीट में भी उनके विचारों और गतिविधियों को लेकर बातें दर्ज हैं।
ग्रोवर ने एक और अहम सवाल उठाया। उनका कहना था कि उमर खालिद को ‘अंडर-ट्रायल’ कहना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि छह साल बाद भी मामला ट्रायल शुरू होने से पहले के चरण में है। यानी आरोपों की न्यायिक जांच और गवाहों-सबूतों की बाकायदा सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है।
‘विचारों से डरने वाला लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता’
वृंदा ग्रोवर ने मौजूदा राजनीतिक माहौल में असहमति की जगह को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अलग राय रखना उसकी बुनियादी विशेषता है। लेकिन अगर भाषण देने, पोस्टर लगाने या किसी राजनीतिक मांग के समर्थन में नारा लगाने पर भी आपराधिक कार्रवाई का खतरा हो, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चिंता की बात है।
इसी संदर्भ में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ‘उमर खालिद को रिहा करो’ कहना अपराध नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, संविधान को समझने और लोकतंत्र में विश्वास करने वाला व्यक्ति इस मांग को उठा सकता है।
यह बहस सिर्फ उमर खालिद तक सीमित नहीं है। आम नागरिक के लिए भी इसका एक बड़ा सवाल है—सरकार या व्यवस्था से असहमति रखने की सीमा आखिर कहां तक है? लोकतंत्र में नागरिकों को सवाल पूछने और अपनी राय रखने की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट के जमानत फैसले पर भी उठाए सवाल
ग्रोवर ने उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी अपनी असहमति जताई। कोर्ट ने दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के संदर्भ में खालिद की भूमिका को अन्य आरोपियों से अलग माना था और उन्हें कथित तौर पर इस साजिश का ‘वैचारिक सूत्रधार’ बताया था।
ग्रोवर ने कहा कि गुलफिशा फातिमा मामले में आए फैसले के बाद CAA विरोधी आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच एक तरह की ‘हायरार्की’ बनाई गई है। उन्होंने यह भी कहा कि CAA के प्रावधानों को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं और कई लोगों का मानना है कि धर्म के आधार पर नागरिकता से जुड़े प्रावधान संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।
हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये वृंदा ग्रोवर के तर्क और राय हैं। इन्हें अदालत के अंतिम निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
UAPA, लंबी हिरासत और ‘जमानत, जेल नहीं’ की बहस
वृंदा ग्रोवर ने सैयद इफ़्तिखार अंद्राबी बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी, जम्मू (2026) मामले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में दो जजों की पीठ ने गुलफिशा फातिमा मामले में दो जजों की पीठ के फैसले पर सवाल उठाए थे।
उनका जोर सुप्रीम कोर्ट के केए नजीब मामले में दिए गए उस सिद्धांत पर था, जिसमें कहा गया था कि अगर किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ रहा हो और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना न हो, तो UAPA के तहत जमानत पर लागू कड़े प्रतिबंधों को एक अलग नजरिए से देखा जा सकता है। इस सिद्धांत का मूल विचार यह है कि लंबे समय तक मुकदमा शुरू न होना संवैधानिक स्वतंत्रता के सवाल खड़े कर सकता है।
ग्रोवर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों के फैसलों में इस मुद्दे पर बहस की गुंजाइश है। उनका कहना था कि अगर पुलिस के पास पर्याप्त सबूत हैं, तो निष्पक्ष ट्रायल होना चाहिए और उन्हीं सबूतों के आधार पर आरोप साबित किए जाने चाहिए। लेकिन बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में रखना ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिसे सामान्य मान लिया जाए।
उमर खालिद का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सिर्फ एक आरोपी की जमानत का सवाल नहीं रह जाता। यह उस बड़े सवाल से जुड़ जाता है कि लोकतंत्र में असहमति रखने वाले नागरिक के अधिकार और राज्य की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कानून अपना काम करे, आरोपों की जांच हो और अदालत फैसला दे—लेकिन उस प्रक्रिया की गति भी न्याय का ही हिस्सा है।



