धर्म बदलने से खत्म नहीं होता ST दर्जा! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया कब बची रहती है आदिवासी पहचान

धर्म बदलने से खत्म नहीं होता ST दर्जा! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया कब बची रहती है आदिवासी पहचान

धर्म बदलना अपने आप किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा खत्म नहीं करता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ किया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की ST पहचान तय करने के लिए केवल उसका धर्म नहीं देखा जा सकता। इसके बजाय यह जांचना जरूरी है कि वह संबंधित जनजातीय समुदाय से अब भी जुड़ा है या नहीं, उसकी पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन से भागीदारी बनी हुई है या नहीं और समुदाय उसे अपनी सदस्यता के रूप में स्वीकार करता है या नहीं। हालांकि, कोर्ट ने मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता के पक्ष में राहत देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह भुइयां समुदाय से अपना लगातार जुड़ाव साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं दे सकीं।

जमीन के सौदों से शुरू हुआ विवाद, पहुंचा हाईकोर्ट तक

मामला नन्हकी उर्फ नईमुन्निसा से जुड़ा है। उन्होंने खुद को भुइयां अनुसूचित जनजाति का सदस्य बताते हुए दुद्धी, सोनभद्र के डिप्टी कलेक्टर के तीन अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी थी।

इन आदेशों में उनके पक्ष में हुए जमीन के तीन ट्रांसफर को अमान्य कर दिया गया था। अधिकारियों का कहना था कि ये लेन-देन उन कानूनी प्रावधानों के खिलाफ थे, जो ST समुदाय की जमीन को गैर-ST व्यक्ति के पक्ष में ट्रांसफर करने पर रोक लगाते हैं।

इस मामले में यूपी जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-B और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 99 महत्वपूर्ण थीं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि उनका जन्म भुइयां ST समुदाय में हुआ था और उनके पास तहसीलदार द्वारा जारी वैध अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र भी मौजूद है। उन्होंने यह भी दलील दी कि जिन लोगों ने जमीन बेची, वे गौर ST समुदाय से आते हैं। इसलिए उनके अनुसार जमीन का ट्रांसफर ST समुदाय के सदस्यों के बीच हुआ था और इसे अवैध नहीं माना जाना चाहिए।

शादी, नाम और धार्मिक पहचान पर उठा ST दर्जे का सवाल

राज्य की ओर से इस दावे पर ही सवाल खड़ा किया गया। रिकॉर्ड में सामने आया कि याचिकाकर्ता ने एक मुस्लिम व्यक्ति से इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। इसके बाद वह नईमुन्निसा नाम से जानी गईं। वह कई दशकों तक अपने पति के साथ रहीं और उनके दो बच्चे भी हुए, जिनके नाम मुस्लिम नामों के अनुसार दर्ज थे।

परिवार रजिस्टर में भी उनका धर्म मुस्लिम दर्ज था।

राज्य का तर्क था कि लंबे समय तक अलग धार्मिक और सामाजिक माहौल में रहने के कारण यह देखना जरूरी है कि क्या संबंधित तारीखों पर उनकी मूल जनजातीय पहचान वास्तव में कायम थी।

इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने कहा कि मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने के बावजूद उन्होंने अपनी भुइयां जनजातीय पहचान नहीं छोड़ी। उनका कहना था कि वह अपने गांव में ही रहती रहीं और भुइयां समुदाय के रीति-रिवाजों का पालन करती रहीं। उनके मुताबिक ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो कि वह समुदाय से अलग हो चुकी थीं।

हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ धर्म देखकर फैसला नहीं हो सकता

जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ‘चिंथडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य’ फैसले का सहारा लिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि धर्म बदलते ही व्यक्ति की ST सदस्यता अपने आप समाप्त हो जाए। किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा तय करने के लिए उसकी वास्तविक जनजातीय पहचान को देखा जाना चाहिए।

इसमें कई पहलू अहम हो सकते हैं—पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजाति द्वारा व्यक्ति की स्वीकार्यता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ किसी दस्तावेज में व्यक्ति का धर्म मुस्लिम लिखा होना अपने आप ST दर्जा खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी तरह किसी व्यक्ति से यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वह जीवनभर समुदाय की हर एक परंपरा का अक्षरशः पालन करता रहे।

यानी अदालत ने धर्म और जनजातीय पहचान को एक ही चीज मानने से इनकार किया।

लेकिन इस मामले में सबूतों की कमी ने बदल दिया फैसला

फिर सवाल उठा कि अगर धर्म परिवर्तन निर्णायक नहीं है, तो याचिकाकर्ता को राहत क्यों नहीं मिली?

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में समस्या धर्म नहीं, बल्कि भुइयां समुदाय से लगातार जुड़े रहने के पर्याप्त प्रमाणों की कमी थी।

अदालत ने याचिकाकर्ता की शादी, बाद में इस्तेमाल किए गए नाम, पारिवारिक जीवन, बच्चों के नाम, परिवार रजिस्टर में दर्ज जानकारी और जांच के दौरान सामने आई अन्य सामग्री को समग्र रूप से देखा।

कोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता यह दिखाने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय सबूत नहीं दे सकीं कि इतने लंबे समय के दौरान उनका भुइयां समुदाय के रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन और सामुदायिक गतिविधियों से लगातार संबंध बना रहा। वह यह भी संतोषजनक तरीके से साबित नहीं कर पाईं कि समुदाय उन्हें अब भी अपनी सदस्य के रूप में स्वीकार करता था।

ST प्रमाण पत्र पर भी अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि प्रमाण पत्र निश्चित रूप से अहम सबूत है। लेकिन अगर बाद में ऐसी जानकारी सामने आती है, जिससे दर्जे पर सवाल उठता है, तो सक्षम अधिकारी उसकी स्थिति की जांच कर सकते हैं।

अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि जमीन के बिक्री विलेख जिन तारीखों पर किए गए, उस समय याचिकाकर्ता के पास भुइयां ST का दर्जा कायम था, यह वह साबित नहीं कर सकीं। इसलिए जमीन के ट्रांसफर पर लगी कानूनी रोक लागू मानी गई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और राजस्व अधिकारियों के आदेशों को बरकरार रखा।

इस फैसले का व्यापक संदेश साफ है। धर्म परिवर्तन और ST दर्जे के बीच कोई स्वतः लागू होने वाला संबंध नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति का जनजातीय दर्जा विवादित होने पर अदालत उसके पूरे सामाजिक और सामुदायिक जुड़ाव को तथ्यों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर देख सकती है। इस मामले में फैसला किसी एक दस्तावेज या केवल धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि वर्षों की परिस्थितियों और जनजातीय समुदाय से निरंतर संबंध साबित न कर पाने के आधार पर दिया गया।

Case Title: Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others along with connected petitions, 2026 LiveLaw (AB) 705