कमजोर मानसून अब सिर्फ खेतों की चिंता नहीं रह गया है। इसका असर आने वाले महीनों में चावल, गेहूं और दालों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इस साल मानसून सीजन में बारिश सामान्य से करीब 15 फीसदी कम रही है। अगर सितंबर के अंत तक यही स्थिति बनी रहती है तो 2009 के बाद यह सबसे कमजोर मानसून हो सकता है। ऐसे में सरकार महंगाई को काबू में रखने के लिए चावल और गेहूं के निर्यात पर दोबारा पाबंदी लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है। दूसरी तरफ दालों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बारिश की कमी का असर सिर्फ खरीफ की फसल तक सीमित नहीं है। जलाशयों में कम पानी और मिट्टी में घटती नमी अब रबी सीजन के लिए भी चिंता बढ़ा रही है। यानी आने वाले महीनों में सरकार के सामने एक साथ उत्पादन और कीमत—दोनों को संभालने की चुनौती हो सकती है।
कमजोर बारिश से खरीफ के बाद रबी पर भी नजर
इस साल खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले करीब 15 लाख हेक्टेयर पीछे चल रही है। कम बारिश का सीधा असर खेतों में नमी और फसलों की स्थिति पर पड़ रहा है।
अब चिंता रबी की फसलों को लेकर है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता के मुकाबले करीब 131 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी उपलब्ध है। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 165 BCM था। यानी जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में लगभग 20 फीसदी कम है।
क्षेत्रीय स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी क्षमता से करीब 48 फीसदी कम है, जबकि उत्तर भारत में यह कमी करीब 36 फीसदी बताई गई है।
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में रबी फसलों की सिंचाई के लिए हिमाचल प्रदेश और पंजाब के बांधों का पानी अहम है। ऐसे में जलाशयों में कम पानी और खेतों में कम नमी रबी की बुवाई पर दबाव डाल सकती है।
चावल-गेहूं पर फिर लग सकता है एक्सपोर्ट ब्रेक
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाद्य महंगाई को काबू में रखना है। अगर घरेलू उत्पादन पर मौसम का असर पड़ता है तो बाजार में अनाज की उपलब्धता और कीमत दोनों पर दबाव बन सकता है।
इसी वजह से चावल और गेहूं के निर्यात पर फिर से पाबंदी लगाने का विकल्प सामने आया है। मकसद घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और कीमतों में तेज बढ़ोतरी को रोकना होगा।
हालांकि, अभी इसे अंतिम सरकारी फैसला नहीं कहा जा सकता। कमजोर मानसून और उत्पादन पर संभावित असर को देखते हुए यह एक नीतिगत विकल्प के तौर पर सामने है।
आम उपभोक्ता के लिए इसका सीधा मतलब है कि सरकार की प्राथमिकता फिलहाल घरेलू बाजार में अनाज की उपलब्धता और कीमतों को स्थिर रखना हो सकती है। इसका असर आगे चलकर किराना बजट पर भी पड़ सकता है, क्योंकि चावल और गेहूं रोजमर्रा की खपत की प्रमुख चीजें हैं।
दालों की कीमत रोकने के लिए आयात का सहारा
अनाज के साथ सरकार की नजर दालों पर भी है। कमजोर बारिश से घरेलू उत्पादन प्रभावित होने की आशंका के बीच सरकार पहले से आयात का विकल्प तैयार कर रही है, ताकि बाजार में दालों की कमी न हो और कीमतों पर दबाव सीमित रहे।
भारत में अरहर के बाद मसूर बड़े पैमाने पर आयात की जाने वाली प्रमुख दालों में शामिल है। कुल दाल आयात में मसूर की हिस्सेदारी करीब 19 फीसदी बताई गई है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 59.64 लाख टन दालों का आयात किया। इससे पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह मात्रा करीब 72.56 लाख टन थी। यानी पिछले साल के मुकाबले आयात कम रहा। इसकी एक वजह घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी बताई गई है।
अब अगर मौसम के कारण घरेलू पैदावार पर दबाव आता है तो आयात के जरिए बाजार में उपलब्धता बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है।
कनाडा से मसूर की सप्लाई बनाए रखने की तैयारी
मसूर के मामले में भारत की निर्भरता काफी हद तक कनाडा से होने वाले आयात पर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस साल कनाडा में करीब 33 लाख मीट्रिक टन मसूर का उत्पादन हुआ है।
इसी को देखते हुए भारत ने कनाडा के साथ पहले से बातचीत कर रखी है, ताकि जरूरत पड़ने पर मसूर की सप्लाई में कोई बड़ी बाधा न आए।
कुल तस्वीर देखें तो कमजोर मानसून ने सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ कम बारिश और जलाशयों में घटता पानी खरीफ और रबी उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। दूसरी तरफ खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखना जरूरी है।
ऐसे में सरकार की रणनीति घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने, जरूरत पड़ने पर अनाज के निर्यात को सीमित करने और दालों का आयात बढ़ाने के आसपास घूमती दिख रही है। आने वाले हफ्तों में बारिश, जलाशयों का स्तर और फसलों की स्थिति यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि इन विकल्पों में से किन पर वास्तव में अमल किया जाता है।


