सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी में कथित प्रशासनिक गड़बड़ियों को लेकर पोस्ट करना एक छात्र को भारी पड़ गया था। महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी, पूर्वी चंपारण ने पहले उसे सस्पेंड किया और फिर अनिश्चित काल के लिए यूनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया। मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने यूनिवर्सिटी की कार्रवाई को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी छात्र को जांच रिपोर्ट दिए बिना और प्रस्तावित सजा पर अपना पक्ष रखने का उचित मौका दिए बिना इतनी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
मामला यूनिवर्सिटी के मीडिया स्टडीज विभाग के पहले सेमेस्टर के पोस्ट-ग्रेजुएट छात्र आकाश कुमार से जुड़ा है। छात्र ने अपनी याचिका में सस्पेंशन और उसके बाद हुए निष्कासन आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस हरीश कुमार की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई की।
कर्मचारी के प्रमोशन पर सवाल उठाने से शुरू हुआ विवाद
पूरा विवाद यूनिवर्सिटी के एक नॉन-टीचिंग कर्मचारी दिनेश हुड्डा की प्रमोशन प्रक्रिया को लेकर शुरू हुआ। छात्र का आरोप था कि प्रमोशन की प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां हुईं। उसने दावा किया कि उसने और कुछ अन्य लोगों ने इस संबंध में शिकायत भी की, लेकिन कथित अनियमितताओं पर यूनिवर्सिटी की ओर से कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद छात्र ने खुद को व्हिसलब्लोअर बताते हुए सोशल मीडिया के जरिए इन कथित प्रशासनिक गड़बड़ियों को सार्वजनिक किया।
यूनिवर्सिटी ने इसे गंभीरता से लिया। 12 जुलाई 2024 को चीफ प्रॉक्टर की ओर से छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसमें उसके व्यवहार को एक छात्र के लिए अनुचित और अनुशासनहीन बताया गया। साथ ही आरोप लगाया गया कि उसका कृत्य साइबर अपराध से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों के दायरे में आता है।
छात्र ने 18 जुलाई को अपना जवाब दिया। उसने अपने बचाव के साथ संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की। इसके अगले ही दिन, 19 जुलाई को उसे एक और कारण बताओ नोटिस मिला, जिसका जवाब उसने 25 जुलाई को दिया।
जवाब देने के बावजूद पहले सस्पेंशन, फिर निष्कासन
छात्र के जवाब के बावजूद 25 जुलाई 2024 को उसे सस्पेंड कर दिया गया। इसके बाद 14 अगस्त 2024 को यूनिवर्सिटी ने उसके खिलाफ और कड़ा कदम उठाया।
उसे तत्काल प्रभाव से यूनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया गया। इतना ही नहीं, उसे यूनिवर्सिटी के किसी भी कैंपस या परिसर में प्रवेश करने और किसी भी अध्ययन कार्यक्रम में दोबारा दाखिला लेने से भी रोक दिया गया।
छात्र ने हाईकोर्ट में कहा कि यह निष्कासन अनिश्चित अवधि के लिए था। उसका तर्क था कि इतनी बड़ी सजा देने से पहले उसे प्रस्तावित निष्कासन के बारे में अलग से कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया। साथ ही अनुशासन समिति ने जो जांच की, उसकी रिपोर्ट और जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री भी उसे उपलब्ध नहीं कराई गई।
हाईकोर्ट ने Ordinance में खोजा जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने Central Universities Act, 2009 के Ordinance 17 की भी जांच की। यह नियम छात्रों में अनुशासन बनाए रखने से संबंधित है।
Ordinance के Clause 4 में छात्र के खिलाफ जुर्माना, कैंपस में प्रवेश पर रोक, निष्कासन और रस्टिकेशन जैसी सजा का प्रावधान है। लेकिन Clause 6 यह भी कहता है कि ऐसी सजा देने से पहले छात्र को अपना बचाव करने का उचित अवसर दिया जाना जरूरी है।
अदालत ने Ordinance 17 के Clause 22(b) का भी उल्लेख किया। इसके तहत प्रॉक्टर को किसी छात्र को अधिकतम दो सप्ताह के लिए सस्पेंड या रस्टिकेट करने का अधिकार दिया गया है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए मॉडल Ordinance 49 के Clause 12(2) में भी इसी तरह की सीमा का प्रावधान है।
हाईकोर्ट ने शुरुआती सस्पेंशन की वैधता पर उस स्तर पर फैसला करना जरूरी नहीं समझा। लेकिन बाद की अनुशासनात्मक प्रक्रिया में अदालत को गंभीर कमियां जरूर मिलीं।
जांच रिपोर्ट नहीं दी, निष्कासन पर अलग नोटिस भी नहीं
अदालत ने पाया कि मामला अनुशासन समिति को भेजे जाने के बावजूद छात्र को समिति की रिपोर्ट नहीं दी गई। जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री भी उसके सामने नहीं रखी गई।
इससे भी अहम बात यह थी कि यूनिवर्सिटी ने अनिश्चित काल के निष्कासन जैसा कठोर फैसला लेने से पहले छात्र को ऐसा कोई विशेष शो-कॉज नोटिस नहीं दिया, जिसमें साफ तौर पर बताया गया हो कि उसे यूनिवर्सिटी से क्यों न निष्कासित किया जाए।
अदालत ने माना कि यह प्रक्रिया निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कोर्ट के मुताबिक प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, उसे आरोपों और प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में उचित जानकारी देकर अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर दिया जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनिश्चित काल के लिए निष्कासन पहली नजर में एक्ट और संबंधित ऑर्डिनेंस के तहत अधिकृत कार्रवाई भी नहीं लगती।
छात्र की वापसी का आदेश, पढ़ाई और परीक्षा जारी रख सकेगा
इन आधारों पर पटना हाईकोर्ट ने 14 अगस्त 2024 के निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया। यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया गया कि वह छात्र को वापस ले और उसे अपना कोर्स पूरा करने दे।
अदालत ने छात्र को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति देने का भी निर्देश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह उम्मीद भी जताई कि छात्र आगे यूनिवर्सिटी में अनुशासन बनाए रखेगा।
इस फैसले का मुख्य संदेश प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा है। किसी छात्र पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन कार्रवाई तय नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के मुताबिक होनी चाहिए। खासकर तब, जब फैसला किसी छात्र की पढ़ाई और उसके अकादमिक भविष्य पर सीधा असर डाल सकता हो।
मामला: Akash Kumar v. Union of India and Ors.



