महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने करीब 44 महीने बाद पहली बार रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी करने का ऐलान किया। इस फैसले का सीधा असर उन लोगों की जेब पर पड़ सकता है, जिनके होम लोन, कार लोन या दूसरे रिटेल लोन की ब्याज दरें रेपो रेट से जुड़ी हैं। महंगाई के मोर्चे पर दबाव बढ़ने के कारण केंद्रीय बैंक ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है।
44 महीने बाद क्यों बदला RBI का रुख?
RBI ने लंबे समय तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी से दूरी बनाए रखी थी। मौजूदा साल की पिछली चार MPC बैठकों में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इससे पहले 2025 में फरवरी से दिसंबर के बीच RBI ने कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने दरों को स्थिर रखने का रास्ता अपनाया।
अब हालात बदल गए हैं। महंगाई पर नए सिरे से दबाव बन रहा है और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने RBI की चिंता बढ़ा दी है। खास तौर पर पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है।
भारत कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर जल्दी दिखाई दे सकता है। पेट्रोल-डीजल और परिवहन लागत के अलावा इसका असर उत्पादन और दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि RBI ने महंगाई के खिलाफ अपना रुख फिर सख्त किया है।
सिर्फ तेल नहीं, सप्लाई पर भी बढ़ा दबाव
महंगाई की चिंता केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में तनाव के चलते नेचुरल गैस की सप्लाई, खाद और दूसरी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर भी दबाव बढ़ा है।
दूसरी तरफ El Niño की स्थिति ने मानसून को प्रभावित किया है। कम बारिश का असर कृषि उत्पादन पर पड़ा है और आगे भी इसका असर बने रहने की आशंका जताई गई है। अगर फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य वस्तुओं की सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
यानी RBI के सामने महंगाई बढ़ने के कई कारण एक साथ मौजूद हैं। तेल महंगा है, आयातित वस्तुओं की लागत पर दबाव है और कृषि क्षेत्र भी मौसम संबंधी जोखिमों से जूझ रहा है।
इसी माहौल में ब्याज दर बढ़ाने का फैसला केंद्रीय बैंक के लिए महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश का हिस्सा है।
रेपो रेट बढ़ने से आपकी EMI पर क्या असर पड़ेगा?
रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए पैसा उपलब्ध कराता है। जब यह दर बढ़ती है तो बैंकों के लिए फंडिंग की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर लोन की ब्याज दरों पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का असर होम लोन, कार लोन और दूसरे रिटेल लोन लेने वाले ग्राहकों पर पड़ सकता है।
खासकर जिन लोगों की लोन ब्याज दरें रेपो रेट जैसे बाहरी बेंचमार्क से जुड़ी हैं, उनके लिए ब्याज दर में बदलाव महत्वपूर्ण होता है। ऐसे ग्राहकों की EMI बढ़ सकती है या लोन की अवधि बढ़ सकती है, यह बैंक की ब्याज दरों और लोन की शर्तों पर निर्भर करेगा।
दूसरी तरफ जमा पर मिलने वाली ब्याज दरों में भी बदलाव की संभावना रहती है। हालांकि इसका वास्तविक असर अलग-अलग बैंकों के फैसलों पर निर्भर करेगा।
दिसंबर में फिर बढ़ सकती है ब्याज दर?
RBI के हालिया फैसले के बाद अब बाजार की नजर दिसंबर की MPC बैठक पर भी है। गवर्नर संजय मल्होत्रा की टिप्पणियों से संकेत मिला है कि अगर महंगाई का दबाव और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां इसी तरह बनी रहती हैं तो आगे भी दरों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पश्चिम एशिया का तनाव, कच्चे तेल की कीमतें और El Niño से जुड़े जोखिम आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में अहम रहेंगे।
वैश्विक स्तर पर भी केंद्रीय बैंक महंगाई को लेकर सतर्क हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी हाल में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। ऐसे माहौल में RBI के लिए महंगाई और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।
फिलहाल RBI का संदेश साफ है—महंगाई के दबाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 44 महीने बाद रेपो रेट में हुई यह बढ़ोतरी बताती है कि केंद्रीय बैंक अब कीमतों के मोर्चे पर ज्यादा सतर्क हो गया है। आने वाले महीनों में तेल, खाद्य वस्तुओं और सप्लाई की स्थिति कैसी रहती है, इसी से तय होगा कि ब्याज दरों का अगला रुख क्या होगा।


