शिवसेना के चुनाव चिह्न पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, ECI ने ‘विधायी बहुमत’ चुना तो बाकी विकल्प क्यों छोड़े?

शिवसेना के चुनाव चिह्न पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, ECI ने ‘विधायी बहुमत’ चुना तो बाकी विकल्प क्यों छोड़े?

शिवसेना के चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बुधवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि जब शिवसेना के दोनों गुटों के बीच विवाद का फैसला करने के लिए चुनाव आयोग के पास कई विकल्प मौजूद थे, तो उसने ‘विधायी बहुमत’ यानी किस गुट के पास ज्यादा विधायक हैं, इसी आधार को क्यों चुना? कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि क्या आयोग ने उस विकल्प पर विचार किया था, जिसमें किसी भी गुट को पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न देने से इनकार किया जा सकता था।

मामला उद्धव ठाकरे की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई थी और उसे पार्टी का पारंपरिक ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की अनुमति मिली थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।

ECI के सामने चार रास्ते थे, कोर्ट ने चौथे पर पूछा सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग के सामने मौजूद संभावित विकल्पों पर खास तौर पर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, आयोग किसी विवाद में पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे को देख सकता था। दूसरा रास्ता संगठनात्मक बहुमत का था। तीसरा विकल्प विधायी बहुमत यानी निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या को आधार बनाना था। वहीं चौथा और आखिरी विकल्प यह था कि किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न न दिया जाए।

कोर्ट का सवाल यही था कि अगर आयोग ने पहले तीन विकल्पों पर विचार किया, तो चौथे विकल्प को अपने फैसले में जगह क्यों नहीं दी गई।

जस्टिस बागची ने कहा कि अगर आयोग यह मानता था कि शिवसेना का ‘धनुष-बाण’ चिह्न ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व रखता है और इसे किसी एक गुट को देना उचित नहीं है, तो वह इस आधार पर किसी भी गुट को चिह्न न देने का रास्ता अपना सकता था। लेकिन आयोग के फैसले में इस विकल्प पर पर्याप्त चर्चा दिखाई नहीं देती।

‘विधायी बहुमत’ पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाई आपत्ति?

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न आदेश के पैराग्राफ 15 में किसी एक खास टेस्ट को अनिवार्य नहीं किया गया है। ऐसे में आयोग मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उचित तरीका चुन सकता है।

कौल का तर्क था कि आयोग ने पाया था कि पार्टी का संविधान और संगठनात्मक बहुमत इस मामले में व्यावहारिक आधार नहीं बन रहे थे। इसलिए विधायी ताकत को आधार बनाया गया।

लेकिन जस्टिस बागची ने ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के गवर्नर के प्रधान सचिव’ मामले में संविधान पीठ की टिप्पणियों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उस फैसले में विधायी बहुमत के आधार की सीमाओं पर चर्चा की गई थी। संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि पैराग्राफ 15 के तहत पार्टी विवादों को तय करने के लिए कोई एक तय टेस्ट नहीं हो सकता।

कोर्ट ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि विधायी बहुमत को पूरी तरह खारिज करना और उसे हर मामले में निर्णायक आधार मान लेना—दोनों अलग बातें हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान पीठ ने विधायी टेस्ट की कमजोरी पर चर्चा की थी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या ECI इसे अकेले निर्णायक आधार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

‘किसी एक गुट को इनाम क्यों?’ कोर्ट ने उठाया असाधारण विकल्प

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक अहम सवाल रखा। उन्होंने कहा कि अगर उपलब्ध टेस्ट दोनों गुटों में से किसी एक को चुनने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हैं, तो किसी एक गुट को पार्टी और उसका चुनाव चिह्न देने की जरूरत क्यों होनी चाहिए?

उन्होंने इस स्थिति में किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न न देने के विकल्प का उल्लेख किया। हालांकि, कोर्ट ने खुद माना कि यह बेहद असाधारण कदम होगा। इसकी तुलना उन्होंने ‘सबसे दुर्लभ’ स्थिति से की, क्योंकि किसी राजनीतिक दल से उसका आरक्षित चुनाव चिह्न छीनना उसके लिए बेहद गंभीर परिणाम वाला कदम हो सकता है।

जस्टिस बागची ने इसी संदर्भ में सवाल किया कि अगर यह विकल्प इतना गंभीर था, तो भी ECI को कम से कम अपने आदेश में यह बताना चाहिए था कि उसने इस रास्ते को क्यों नहीं अपनाया।

उन्होंने कहा कि कोर्ट यह नहीं कह रहा कि ECI को निश्चित रूप से चौथा विकल्प चुनना चाहिए था। सवाल केवल यह है कि क्या आयोग ने सभी प्रासंगिक विकल्पों पर विचार किया था।

अब मामला ‘फैसला सही या गलत’ से ज्यादा प्रक्रिया पर

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का एक अहम पहलू न्यायिक समीक्षा से जुड़ा है। जस्टिस बागची ने साफ किया कि अदालत खुद चुनाव आयोग की जगह फैसला नहीं लेना चाहती। कोर्ट यह भी नहीं कह रहा कि उसे अपनी पसंद का टेस्ट लागू करना चाहिए।

मुद्दा यह है कि अगर किसी संवैधानिक अथॉरिटी के सामने चार संभावित रास्ते हों और वह उनमें से एक महत्वपूर्ण विकल्प पर विचार ही न करे, तो क्या उसका फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में जांचा जा सकता है?

जस्टिस बागची ने कहा कि अगर ECI अपने आदेश में यह बताता कि ‘धनुष-बाण’ जैसे ऐतिहासिक महत्व वाले चिह्न के कारण किसी गुट को चिह्न न देने का विकल्प क्यों उचित नहीं था, तो अदालत के लिए फैसले की प्रक्रिया को समझना आसान होता।

उन्होंने पुराने ‘सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले का भी उल्लेख किया। इसमें कांग्रेस के चुनाव चिह्न से जुड़े ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया गया था।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। शिंदे गुट की ओर से नीरज किशन कौल ने कहा कि वह अदालत द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब अपनी दलीलों के दौरान देंगे। इस मामले में अब नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले की मेरिट से ज्यादा उसकी निर्णय लेने की प्रक्रिया और सभी संभावित विकल्पों पर विचार किए जाने को किस तरह देखता है।

Case Title: Sunil Prabhu v. Eknath Shinde