SC/ST Act केस में गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ‘सार्वजनिक रूप से’ जातिसूचक अपमान साबित नहीं हुआ तो आरोपियों को राहत

SC/ST Act केस में गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ‘सार्वजनिक रूप से’ जातिसूचक अपमान साबित नहीं हुआ तो आरोपियों को राहत

SC/ST Act के तहत दर्ज एक मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि शिकायतकर्ता के खिलाफ कथित जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के इरादे से किया गया था। अदालत के मुताबिक, कानून की संबंधित धारा के तहत अपराध साबित करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण शर्त है। मामले में चश्मदीद गवाह ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया।

मामला गुजरात का है। आरोप तीन लोगों पर लगाए गए थे। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति यानी चमार समुदाय से संबंधित है। आरोप था कि आरोपियों को उसकी जाति की जानकारी थी और इसी वजह से उन्होंने जानबूझकर उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके साथ ही शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने डंडों से उसके साथ मारपीट भी की। ट्रायल कोर्ट ने हालांकि आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके बाद गुजरात सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।

जातिसूचक शब्दों का आरोप, लेकिन ‘सार्वजनिक अपमान’ साबित नहीं हुआ

हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य सवाल यह बना कि क्या अभियोजन पक्ष SC/ST Act की संबंधित धारा की सभी जरूरी शर्तें साबित कर पाया है।

जस्टिस हेमंत एम. प्रच्छक ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन की ओर से पेश किए गए तीन पुलिस अधिकारियों के बयानों को देखने पर ऐसा नहीं लगता कि आरोपों को संदेह से परे साबित किया गया है।

अदालत ने कहा कि संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत सिर्फ जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह भी साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने के इरादे से सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक रूप से ऐसे शब्द कहे।

इस मामले में शिकायतकर्ता के अलावा किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि आरोपियों ने सार्वजनिक रूप से उसके खिलाफ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। यही बात अभियोजन के मामले के लिए अहम साबित हुई।

चश्मदीद गवाह ने भी नहीं दिया अभियोजन का साथ

मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू चश्मदीद गवाह का बयान रहा। हाईकोर्ट ने पाया कि जिस गवाह से अभियोजन को अपने आरोपों की पुष्टि की उम्मीद थी, उसने मामले की उस कहानी का समर्थन नहीं किया।

अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के अलावा किसी अन्य गवाह ने आरोपियों द्वारा उसे चोट पहुंचाने की बात नहीं कही। यानी मारपीट के आरोप को भी स्वतंत्र गवाही से मजबूत समर्थन नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का भी परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने गवाहों के बयानों को विस्तार से देखने के बाद अपने निष्कर्ष के कारण दर्ज किए थे। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर वह ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से सहमत है कि अभियोजन आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाया।

मारपीट के आरोप पर भी मेडिकल सबूत कमजोर, राज्य की अपील खारिज

मारपीट के आरोपों को लेकर भी हाईकोर्ट ने उपलब्ध सबूतों पर गौर किया। शिकायतकर्ता पेशे से प्लंबर है। अदालत ने कहा कि उसके शरीर पर बताई गई कुछ चोटें उसके काम के दौरान भी लग सकती थीं।

विशेष रूप से दाहिने अंगूठे के पास की चोट के बारे में कोर्ट ने कहा कि पाइप फिटिंग या प्लंबिंग के दौरान ऐसी चोट लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई चोटों को मेडिकल सबूतों से पर्याप्त पुष्टि नहीं मिलती।

हाईकोर्ट ने अंत में कहा कि आरोपियों को कथित अपराध से जोड़ने वाला कोई भरोसेमंद और पर्याप्त सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर दोष साबित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को कायम रखा। कोर्ट का निष्कर्ष साफ था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ मामला बिना किसी उचित संदेह के परे साबित करने में असफल रहा।

यह फैसला यह भी दिखाता है कि SC/ST Act जैसे गंभीर कानून के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद अदालत में दोष साबित करने के लिए कानून में तय जरूरी तत्वों का ठोस साक्ष्य के साथ स्थापित होना आवश्यक है।

Case Title: STATE OF GUJARAT v/s HEMTIBEN ISHWARJI THAKOR & ORS