दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को लेकर हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तीन नेता रिहा हो गए हैं। रिहाई के बाद अभिजीत दिपके के साथ आशुतोष रांका और सौरव दास ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाह रहे लोगों को हिरासत में लिया गया और पुलिस ने उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया। आशुतोष रांका ने दावा किया कि उन्हें फ्लाइट के दौरान ही पकड़ लिया गया। वहीं, अभिजीत दिपके की दादी के निधन का जिक्र करते हुए उन्होंने पुलिस के व्यवहार पर नाराजगी जताई। नेताओं ने साफ कहा कि यह विरोध यहीं खत्म नहीं होगा। हालांकि, पुलिस ने अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के तहत बताया है।
24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रहे CJP नेता, फिर कैसे मिली रिहाई?
कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को एहतियातन हिरासत में लिया था। तीनों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126/170 के तहत हिरासत में रखा गया था।
रविवार, 11 अक्टूबर को तीनों नेताओं को दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन से रिहा कर दिया गया। यह रिहाई एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद हुई। पुलिस स्टेशन के बाहर भारी पुलिस बल तैनात था। सुबह करीब 10:15 बजे तीनों नेता एक SUV में वहां से बाहर निकले।
रिहाई के बाद आशुतोष रांका और सौरव दास ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने हिरासत में लिए जाने की परिस्थितियों और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना चाहते थे, लेकिन उन्हें रोकने के लिए कार्रवाई की गई।
‘फ्लाइट से ही पकड़ लिया’, आशुतोष रांका ने लगाए गंभीर आरोप
रिहाई के बाद आशुतोष रांका ने दावा किया कि उन्हें फ्लाइट के दौरान ही हिरासत में ले लिया गया था। उन्होंने कहा कि पिछले 72 घंटों के अनुभव ने उन्हें आपातकाल के दौर की याद दिला दी। रांका ने यह भी कहा कि उस दौर में भी ट्रेन सेवाएं बंद नहीं की गई थीं, जबकि मौजूदा स्थिति में सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियां लगाई गईं।
उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। रांका का आरोप था कि आयोग भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में काम कर रहा है। हालांकि, यह उनका राजनीतिक आरोप है और उपलब्ध जानकारी में इसे साबित करने वाला कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं दिया गया है।
रांका ने हिरासत के दौरान हुए घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि अभिजीत दिपके को अपने भाई से बात करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिपके की दादी के निधन की खबर मिलने के बाद भी पुलिस का व्यवहार संवेदनशील नहीं था।
उनके मुताबिक, परिवार में शोक की स्थिति के बावजूद कैमरा और माइक लेकर लोग वहां पहुंच गए। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर उन्होंने पुलिस के रवैये पर नाराजगी जाहिर की।
दादी के निधन के बीच अभिजीत दिपके को लेकर क्या बोले साथी?
इस मामले का सबसे भावुक पहलू अभिजीत दिपके की दादी का निधन रहा। आशुतोष रांका के मुताबिक, दिपके को हिरासत में रहने के दौरान यह खबर मिली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय भी पुलिस ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई।
रांका ने कहा कि अभिजीत अपने निजी दुख को किसी सार्वजनिक कार्यक्रम या राजनीतिक आयोजन का हिस्सा नहीं बनाना चाहते थे। उन्होंने यह भी बताया कि रिहाई के बाद अभिजीत अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल होने गए।
ऐसे समय में परिवार के साथ रहने की जरूरत और राजनीतिक गतिविधियों के बीच पैदा हुई स्थिति ने मामले को और संवेदनशील बना दिया। हालांकि, हिरासत के दौरान परिवार से संपर्क करने की अनुमति को लेकर लगाए गए आरोपों पर पुलिस का अलग से विस्तृत जवाब उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है।
रांका ने अपने बयान में साफ कहा कि उनका आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “ये लड़ाई अभी शुरू हुई है।” उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि CJP के नेता इस मुद्दे को आगे भी उठाने की तैयारी में हैं।
दिल्ली पुलिस ने क्या सफाई दी? कानूनी प्रक्रिया का दिया हवाला
तीनों नेताओं की रिहाई के बाद दिल्ली पुलिस ने भी बयान जारी किया। पुलिस के अनुसार, अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को 10 अक्टूबर को BNSS की धारा 126/170 के तहत एहतियाती हिरासत में लिया गया था।
पुलिस ने कहा कि इस दौरान सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया और 11 अक्टूबर को तीनों को दिल्ली कैंट की SEM कोर्ट में पेश किया गया। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
इस पूरे मामले में एक तरफ CJP नेता हिरासत की कार्रवाई और पुलिस के व्यवहार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं पुलिस ने अपनी कार्रवाई को कानून के मुताबिक बताया है। दोनों पक्षों के बयानों के बीच अब यह मामला राजनीतिक और कानूनी चर्चा का विषय बन गया है।
आम लोगों के लिहाज से इस विवाद के दो अहम पहलू हैं। पहला, विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की कार्रवाई किस सीमा तक उचित है। दूसरा, ऐसी कार्रवाई करते समय नागरिकों के अधिकारों और व्यक्तिगत परिस्थितियों का ध्यान कैसे रखा जाता है।
फिलहाल, तीनों नेताओं की रिहाई हो चुकी है। लेकिन उनके आरोपों और पुलिस के पक्ष के बीच उठे सवालों पर आगे क्या स्थिति बनती है, इस पर नजर बनी रहेगी।



