गुजरात हाईकोर्ट सख्त: घर तोड़ने के बाद पुनर्वास के वादे से नहीं पलट सकता सूरत नगर निगम, कोर्ट ने दिया साफ संदेश

गुजरात हाईकोर्ट सख्त: घर तोड़ने के बाद पुनर्वास के वादे से नहीं पलट सकता सूरत नगर निगम, कोर्ट ने दिया साफ संदेश

गुजरात के सूरत में घरों के ध्वस्तीकरण से प्रभावित परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद जगी है। गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत नगर निगम को साफ संकेत दिया है कि वह घर गिराने के बाद प्रभावित लोगों को आवास देने के अपने वादे से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने कहा कि जब निगम पहले ही पुनर्वास के लिए सहमत हो चुका है, तो अब जिम्मेदारी से बचने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों की गलती का बोझ उन नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता, जिनके घर गिराए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी। तब नगर निगम को यह बताना होगा कि वह प्रभावित परिवारों को घर देगा या मुआवजे के जरिए विवाद का समाधान करेगा।

घर गिराने के बाद बदला रुख, हाईकोर्ट ने निगम को लगाई फटकार

यह मामला सूरत के नासिर नगर इलाके का है, जहां जून में चलाए गए ध्वस्तीकरण अभियान के दौरान कई आवासीय ढांचे गिराए गए थे। प्रभावित लोगों ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए पुनर्वास की मांग की। उनका आरोप है कि नगर निगम की ओर से जिन वैकल्पिक मकानों की पेशकश की गई, उनकी हालत रहने लायक नहीं है।

मामले की सुनवाई जस्टिस निखिल एस. करियल कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने नगर निगम के रुख पर सवाल उठाए। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि निगम पहले प्रभावित लोगों को आवास उपलब्ध कराने पर सहमत हुआ था। अब वह इस समझौते से पीछे नहीं हट सकता।

अदालत के मुताबिक, प्रभावित परिवारों को आवास देना तय हुआ था। इसकी व्यवस्था किस तरह की जाएगी, यह नगर निगम की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि निगम के पास पर्याप्त धन है। ऐसे में आर्थिक संसाधनों की कमी को जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

केंद्र सरकार की योजना का हवाला देकर नहीं बच सकती जिम्मेदारी

सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि प्रभावित लोगों का पुनर्वास पहले की जवाहरलाल नेहरू योजना के तहत किया जा सकता था। हालांकि, याचिकाकर्ता इस विकल्प को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नगर निगम अपनी जिम्मेदारी किसी सरकारी योजना पर नहीं डाल सकता। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार की योजनाओं का इस्तेमाल निगम की कथित गलती को सुधारने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट का कहना था कि जब नगर निगम ने आवासीय ढांचे गिराए हैं, तो उसे प्रभावित लोगों के लिए समाधान भी देना होगा। वह केवल यह कहकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता कि किसी योजना के तहत मकान दिए जा सकते थे, लेकिन अब ऐसा करना संभव नहीं है।

अदालत ने वैकल्पिक आवासों की स्थिति पर भी सवाल उठाया। कोर्ट की टिप्पणी का संकेत साफ था कि केवल मकान आवंटित करने की पेशकश पर्याप्त नहीं है। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का समाधान व्यावहारिक होना चाहिए, ताकि वे सम्मान के साथ रह सकें।

₹10 लाख मुआवजे की मांग पर भी हुई चर्चा

सुनवाई के दौरान नगर निगम के वकील ने याचिकाकर्ताओं के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि प्रभावित लोगों ने 10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग भी की है। ऐसे में विवाद का समाधान मुआवजा देकर किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने भी कहा कि यदि निगम उन्हें रहने योग्य मकान उपलब्ध नहीं करा सकता, तो प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक रूप से मुआवजा दिया जा सकता है।

इस पर हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि उसे समझ में आ रहा है कि याचिकाकर्ता मुआवजा स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। अब नगर निगम को तय करना है कि वह प्रभावित लोगों को आवास उपलब्ध कराएगा या मुआवजा देगा।

हालांकि, अदालत ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं सुनाया है कि प्रभावित परिवारों को मकान दिए जाएंगे या उन्हें आर्थिक मुआवजा मिलेगा। फिलहाल कोर्ट नगर निगम से उसके पहले के रुख और मौजूदा स्थिति पर स्पष्ट जवाब चाहता है।

अवैध कब्जे की दलील पर कोर्ट का अहम सवाल, 23 अक्टूबर को अगली सुनवाई

नगर निगम की ओर से यह दलील भी दी गई कि प्रभावित लोगों में कुछ ऐसे हो सकते हैं, जो जमीन पर अवैध कब्जा करके रह रहे थे। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन पर कब्जा वैध था या अवैध, इस सवाल पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

अदालत ने कहा कि यदि ध्वस्तीकरण कानून के मुताबिक किया गया होता, तो निगम इस आधार पर अपनी दलील रख सकता था। लेकिन अब संभावित अवैध कब्जे का हवाला देकर प्रभावित परिवारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि फिलहाल उसके सामने अहम सवाल यह है कि लोगों के आवासीय ढांचे गिराए गए हैं। किसी नागरिक का घर उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना गिराया जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। ध्वस्तीकरण की वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है, लेकिन अदालत ने संकेत दिया कि प्रभावित लोगों की स्थिति सुधारने के लिए निगम को कदम उठाने होंगे।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया गलत कार्रवाई की आशंका पर भी टिप्पणी की। अदालत के मुताबिक, यदि नगर निगम के अधिकारियों ने गलती की है, तो उसकी जवाबदेही निगम की होगी। अधिकारियों से वसूली करनी है या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करनी है, यह निगम का आंतरिक मामला है। इसका नुकसान प्रभावित नागरिकों को नहीं उठाना चाहिए।

अब अदालत ने नगर आयुक्त और नगर निगम के निर्वाचित निकाय के प्रमुख को अगली सुनवाई पर उपस्थित रहने को कहा है। उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि प्रभावित लोगों को आवास देने पर सहमति जताने के बाद निगम ने अपना रुख क्यों बदला।

आम नागरिकों के लिए इस मामले का महत्व: यह सुनवाई इस सवाल को सामने लाती है कि ध्वस्तीकरण के मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी कहां तक जाती है। यदि किसी कार्रवाई के बाद लोगों के घर छिन जाते हैं, तो उनके पुनर्वास और कानूनी अधिकारों पर भी विचार करना जरूरी है। हालांकि, इस मामले में ध्वस्तीकरण की वैधता और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली अंतिम राहत पर अदालत का फैसला अभी आना बाकी है।

अगली सुनवाई: 23 अक्टूबर।