वोटर लिस्ट से नाम हटाने के आरोप में BJP के दो बूथ एजेंटों को राहत, कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोनों FIR पर लगाई रोक

वोटर लिस्ट से नाम हटाने के आरोप में BJP के दो बूथ एजेंटों को राहत, कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोनों FIR पर लगाई रोक

कर्नाटक में मतदाता सूची से कथित तौर पर सैकड़ों लोगों के नाम हटाने की कोशिश के मामले में बीजेपी के दो बूथ लेवल एजेंटों को हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। बेंगलुरु के मल्लेश्वरम विधानसभा क्षेत्र से जुड़े इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोनों एजेंटों के खिलाफ दर्ज दो FIR पर रोक लगा दी है। आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आपत्तियां दाखिल की गई थीं। हालांकि, अदालत के इस आदेश को आरोपों से पूरी तरह बरी किए जाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत दी है और कानूनी विवाद पर आगे विचार होना बाकी है।

क्या है पूरा मामला? 914 मतदाताओं के नामों पर उठाई गई थीं आपत्तियां

यह मामला बेंगलुरु के मल्लेश्वरम विधानसभा क्षेत्र का है। यहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आपत्तियां दाखिल किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

मामले में बीजेपी के दो बूथ लेवल एजेंट जी.एस. वसंतलक्ष्मी और दीपक सिंह आर. के खिलाफ व्यालिकावल और यशवंतपुर पुलिस थानों में FIR दर्ज कराई गई थीं। शिकायत कांग्रेस के एक नेता ने दर्ज कराई थी, जो 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मल्लेश्वरम सीट से चुनाव लड़ चुके हैं।

शिकायत के मुताबिक, वसंतलक्ष्मी ने आठ मतदान केंद्रों के 778 मतदाताओं के नामों को लेकर फॉर्म-7 के जरिए आपत्तियां दर्ज कराई थीं। वहीं, दीपक सिंह आर. ने मतदान केंद्र संख्या 68 के 136 मतदाताओं के नामों पर आपत्ति जताई थी। इस तरह कुल 914 मतदाताओं के नाम इस विवाद के दायरे में आए।

आरोप लगाया गया कि संबंधित मतदाता अब भी उसी विधानसभा क्षेत्र में रह रहे थे, लेकिन उन्हें अनुपस्थित या स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित दिखाकर उनके नाम मतदाता सूची से हटाने की कोशिश की गई।

शिकायत में कुछ फॉर्म पर हस्ताक्षरों में अंतर होने का दावा भी किया गया। इसके आधार पर आशंका जताई गई कि कथित तौर पर गलत जानकारी देने के लिए हस्ताक्षरों में हेरफेर किया गया हो सकता है। हालांकि, ये सभी आरोप हैं और इन्हें अदालत में अंतिम रूप से साबित किया जाना बाकी है।

हाईकोर्ट ने FIR पर क्यों लगाई रोक? एजेंटों ने उठाए कानूनी सवाल

दोनों बूथ एजेंटों ने कर्नाटक हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग की थी। इन याचिकाओं पर जस्टिस अनंत रमनाथ हेगड़े ने सुनवाई की और दोनों मामलों में अंतरिम राहत दी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि फॉर्म-7 से जुड़े कथित अपराध गैर-संज्ञेय और जमानती श्रेणी के हैं। उनके मुताबिक, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 174(2) के तहत ऐसे मामलों की जांच शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होती है।

उन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 217(बी) लागू किए जाने पर भी सवाल उठाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रावधान लोक सेवक को नुकसान पहुंचाने के इरादे से गलत जानकारी देने से संबंधित है। उनके मुताबिक, इस प्रावधान के तहत कार्रवाई के लिए संबंधित लोक सेवक या उसके अधिकृत वरिष्ठ अधिकारी की लिखित शिकायत आवश्यक है।

एजेंटों ने तर्क दिया कि इस मामले में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की ओर से ऐसी शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। शिकायत एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरफ से की गई थी। इसी आधार पर उन्होंने FIR की कानूनी वैधता को चुनौती दी।

क्या फॉर्म-7 से नाम हटाने की आपत्तियों की संख्या तय है?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 और संबंधित नियमों के नियम 13(2) का भी हवाला दिया।

उनका तर्क था कि मतदाता सूची में पहले से दर्ज कोई व्यक्ति फॉर्म-7 के माध्यम से किसी अन्य नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। उनके मुताबिक, संबंधित कानून, नियमों या SIR की पुस्तिका में किसी व्यक्ति अथवा बूथ लेवल एजेंट की ओर से दाखिल की जा सकने वाली आपत्तियों की अधिकतम संख्या तय नहीं की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यदि मतदाता सूची में आपत्तियां दाखिल करने की प्रक्रिया के दौरान कोई अनियमितता हुई है, तो उस पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत संबंधित निर्वाचन अधिकारी के माध्यम से कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका विरोध सीधे पुलिस कार्रवाई किए जाने को लेकर था।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि आपत्तियों की संख्या पर सीमा न होने की दलील अपने आप में किसी भी आपत्ति को सही या वैध साबित नहीं करती। यदि किसी मामले में गलत जानकारी या जाली हस्ताक्षर का आरोप है, तो उसकी जांच और कानूनी स्थिति संबंधित तथ्यों तथा लागू कानून के आधार पर तय होगी।

फिलहाल मिली राहत, लेकिन आरोपों पर अंतिम फैसला बाकी

कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोनों बूथ लेवल एजेंटों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ दर्ज दोनों FIR पर अंतरिम रोक लगा दी। इससे उन्हें फिलहाल राहत मिली है। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणा श्याम ने अधिवक्ता वसंत कुमार, अयप्पा के.जी., अभिलाष सी. और टी. चन्वी मदप्पा के साथ याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी की।

इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने मतदाता सूची से नाम हटाने के आरोपों को गलत घोषित कर दिया है। अदालत ने फिलहाल FIR पर रोक लगाई है। मामले में आरोपों की सच्चाई, शिकायत की वैधता और जांच से जुड़े कानूनी सवालों पर अंतिम निष्कर्ष अलग विषय हैं।

इस मामले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना नागरिक के मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा है। वहीं, मतदाता सूची को सही बनाए रखने के लिए गलत प्रविष्टियों पर आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया भी जरूरी है। ऐसे में सवाल यह है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल नियमों के मुताबिक हुआ या कथित तौर पर किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए गलत जानकारी दी गई।

अब आगे की कानूनी कार्यवाही में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों पर कानून के तहत किस तरह आगे बढ़ा जा सकता है। फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से बीजेपी के दोनों बूथ एजेंटों को राहत मिली है, लेकिन पूरे मामले का अंतिम नतीजा अभी सामने आना बाकी है।