उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी घमासान तेज होने लगा है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आजमगढ़ में जनसभा के दौरान समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि जब मतदाताओं के नाम बचाने की बात आई, तो PDA के मसीहा ने क्या किया? ओवैसी ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में SIR के बाद करीब एक हजार नाम हटाए गए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के कामकाज का हवाला देते हुए कहा कि AIMIM ने हैदराबाद और तेलंगाना में बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाने में मदद की। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति पर भी हमला बोला। ओवैसी ने धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति के मुकाबले गरीबी और आर्थिक असमानता को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने की अपील की।
SIR पर अखिलेश यादव को घेरा, ओवैसी ने पूछा- PDA के मसीहा कहां हैं?
आजमगढ़ की जनसभा में असदुद्दीन ओवैसी ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में SIR की प्रक्रिया के बाद एक हजार नाम हटाए गए हैं। इसी मुद्दे पर उन्होंने अखिलेश यादव को निशाने पर लिया और पूछा कि खुद को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की आवाज बताने वाले PDA नेतृत्व ने मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए?
ओवैसी ने कहा कि उनकी पार्टी ने हैदराबाद और तेलंगाना में लोगों को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में मदद की। उन्होंने दावा किया कि AIMIM ने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी नाम जुड़वाने के लिए बुलाया, क्योंकि पार्टी निष्पक्ष चुनावी मुकाबले में विश्वास करती है।
उनका कहना था कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची में नहीं रहता, तो उसके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों को केवल बयान देने के बजाय पात्र मतदाताओं के नाम दर्ज कराने और गलत तरीके से नाम हटने की शिकायतों पर भी काम करना चाहिए।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में एक हजार नाम हटाए जाने का आंकड़ा ओवैसी के दावे के तौर पर सामने आया है। इस संख्या और उससे जुड़ी परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि खबर में नहीं दी गई है।
नेहरू, गांधी और मौलाना आजाद का जिक्र कर सपा की राजनीति पर सवाल
अपने भाषण में ओवैसी ने जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल को उठाते हुए आरोप लगाया कि जिस तरह पहले मुस्लिम नेतृत्व और उसकी भागीदारी को लेकर बहस होती थी, वैसी ही स्थिति आज अखिलेश यादव की राजनीति में भी दिखाई देती है।
ओवैसी के इस बयान को उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को लेकर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा सकता है। AIMIM लगातार अपनी राजनीतिक जगह बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी भी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के प्रतिनिधित्व को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बताती रही है।
ऐसे में SIR का मुद्दा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। राजनीतिक दल इसे मतदाता अधिकार, सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी रणनीति से जोड़कर उठा रहे हैं।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया का सीधा संबंध नागरिकों के मतदान के अधिकार से है। इसलिए इस विषय पर राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित चुनावी अधिकारियों की जानकारी भी महत्वपूर्ण होगी।
पहले गठबंधन का ऑफर, अब अखिलेश को चुनावी मुकाबले की चेतावनी
ओवैसी इससे पहले भी समाजवादी पार्टी के साथ संभावित गठबंधन को लेकर बयान दे चुके हैं। 4 अक्टूबर को श्रावस्ती जिले के भिनगा में एक जनसभा के दौरान उन्होंने कहा था कि यदि सपा उत्तर प्रदेश में बीजेपी को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना चाहती है, तो AIMIM गठबंधन के लिए तैयार है।
उन्होंने अपने प्रस्ताव को कमजोरी के बजाय राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत बताया था। साथ ही, सपा नेतृत्व को यह संदेश भी दिया कि यदि गठबंधन का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाता, तो AIMIM अपने दम पर चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है।
ओवैसी ने यह भी कहा था कि यदि उनकी पार्टी को जनादेश मिलता है, तो वह न्याय और विकास के साथ मस्जिदों तथा मदरसों की सुरक्षा के लिए काम करेगी।
इन बयानों से साफ है कि AIMIM उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रही है। एक तरफ पार्टी सपा के साथ संभावित गठबंधन का विकल्प खुला रख रही है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव के नेतृत्व और PDA की राजनीति पर सवाल भी उठा रही है।
आने वाले चुनाव में गठबंधन, सीटों का बंटवारा और मतदाता समूहों का समर्थन किस दिशा में जाएगा, यह राजनीतिक दलों के फैसलों और जनता के रुख पर निर्भर करेगा।
‘80-20 नहीं, 99-1 की लड़ाई’, गरीबी को चुनावी मुद्दा बनाने की अपील
ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक विमर्श में चर्चा में रहने वाले ‘80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत’ के संदर्भ को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में चुनावी बहस को धार्मिक आधार पर बांटने के बजाय गरीबी और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर केंद्रित किया जाना चाहिए।
आजमगढ़ की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए ओवैसी ने उत्तर प्रदेश सरकार के अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी विभाग के 2024-25 के आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि आजमगढ़ राज्य के उन जिलों में चौथे स्थान पर है, जहां गरीब लोगों की संख्या सबसे अधिक है।
इसके बाद उन्होंने ‘99 प्रतिशत बनाम 1 प्रतिशत’ का नारा दिया। ओवैसी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक प्रतिशत लोगों के हितों के साथ खड़े हैं, जबकि उनकी राजनीति 99 प्रतिशत लोगों की बात करती है।
यह बयान आर्थिक असमानता, गरीबी और सामाजिक प्रतिनिधित्व को चुनावी चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, 99 प्रतिशत और 1 प्रतिशत का वर्गीकरण ओवैसी के राजनीतिक भाषण का हिस्सा है, न कि किसी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आर्थिक आंकड़े का।
आम मतदाताओं के लिए क्यों अहम है SIR का मुद्दा?
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव में मतदान करने के लिए पात्र नागरिक का नाम सूची में होना जरूरी है। किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने या गलत तरीके से हटने की स्थिति में उसे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संबंधित चुनावी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ सकता है।
अब देखना होगा कि SIR को लेकर उठ रहे सवालों पर चुनाव आयोग और राजनीतिक दल क्या कदम उठाते हैं। साथ ही, उत्तर प्रदेश में AIMIM और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की संभावनाएं किस दिशा में बढ़ती हैं। फिलहाल, ओवैसी के बयान ने मतदाता सूची, PDA की राजनीति और आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति को लेकर बहस तेज कर दी है।



