72 घंटे बाद मेडिकल जांच में नहीं मिला वीर्य, FIR में 3 दिन की देरी भी नहीं बनी राहत, झारखंड हाईकोर्ट ने गैंगरेप के दोषियों की सजा रखी बरकरार

72 घंटे बाद मेडिकल जांच में नहीं मिला वीर्य, FIR में 3 दिन की देरी भी नहीं बनी राहत, झारखंड हाईकोर्ट ने गैंगरेप के दोषियों की सजा रखी बरकरार

झारखंड हाईकोर्ट ने गैंगरेप के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए चारों आरोपियों की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई 20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी। बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि घटना के तीन दिन बाद FIR दर्ज कराई गई, पीड़िता आरोपियों के नाम नहीं बता सकी और मेडिकल जांच में वीर्य भी नहीं मिला। लेकिन हाईकोर्ट ने इन तथ्यों को पीड़िता की गवाही खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। अदालत के मुताबिक, पीड़िता की गवाही भरोसेमंद थी और उसके शरीर पर मिले चोटों के निशान उसके बयान की पुष्टि करते थे। फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में सबूतों का मूल्यांकन करते समय घटना की परिस्थितियों, पीड़िता के बयान और मेडिकल साक्ष्यों को एक साथ देखना जरूरी है।

जंगल के पास हुई वारदात, पीड़िता ने सुनाई पूरी आपबीती

यह मामला 5 नवंबर 2013 का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पीड़िता अपने ससुराल से मायके जा रही थी। इसी दौरान पूर्वी सिंहभूम जिले के लापिट छेंचा जंगल में एपीओ टोला-जेर्का-अमदा पहाड़ी के पास चार आरोपियों ने उसे घेर लिया।

आरोप था कि वे पीड़िता को पकड़कर पास के एक नाले की ओर ले गए और बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता ने बताया कि आरोपियों ने उसका मुंह दबा रखा था। विरोध करने या शोर मचाने पर उसे पानी में डुबोकर मारने की धमकी भी दी गई।

कुछ समय बाद आसपास लोगों के आने-जाने की आहट सुनकर आरोपी वहां से भाग गए। इसके बाद पीड़िता ने मदद के लिए आवाज लगाई। उसे प्रकाश हेम्ब्रम के घर ले जाया गया, जहां उसने रात बिताई।

अगले दिन गांव में पंचायत बुलाई गई, लेकिन आरोपी उसमें शामिल नहीं हुए। इसके बाद 8 नवंबर 2013 को पुलिस में FIR दर्ज कराई गई। इसी मामले में सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 20 साल के कठोर कारावास और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

FIR में तीन दिन की देरी पर कोर्ट ने क्यों स्वीकार की दलील?

आरोपियों की ओर से अपील में FIR दर्ज कराने में हुई देरी पर सवाल उठाया गया। बचाव पक्ष का तर्क था कि घटना के तुरंत बाद शिकायत दर्ज नहीं कराई गई, इसलिए पीड़िता के बयान पर संदेह किया जाना चाहिए।

हालांकि, जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पीड़िता की परिस्थितियों पर गौर किया। वह अशिक्षित विधवा थी और ऐसे गांव में रहती थी, जहां पुलिस के पास जाने से पहले पंचायत बुलाने की परंपरा थी।

अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों में शिकायत दर्ज कराने में हुई तीन दिन की देरी का उचित स्पष्टीकरण मौजूद था। इसलिए केवल देरी के आधार पर पीड़िता की गवाही को अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने मामले को केवल तारीखों और औपचारिकताओं के आधार पर नहीं देखा, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि पीड़िता किन सामाजिक परिस्थितियों से गुजर रही थी।

आरोपियों के नाम नहीं बता पाना और मेडिकल रिपोर्ट में वीर्य न मिलना भी नहीं बना आधार

बचाव पक्ष ने यह सवाल भी उठाया कि पीड़िता आरोपियों के नाम नहीं बता सकी थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने अदालत में आरोपियों को उनके चेहरे से पहचाना था। रिकॉर्ड के अनुसार, उसे आरोपियों के नाम पहली बार गांव में हुई पंचायत के दौरान पता चले थे।

मेडिकल जांच को लेकर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए। घटना के लगभग 72 घंटे बाद हुई जांच में वीर्य नहीं मिला था। अदालत ने कहा कि घटना और मेडिकल परीक्षण के बीच इतना अंतर होने के कारण वीर्य का पता नहीं चलना स्वाभाविक था। पीड़िता की उम्र भी लगभग 50 वर्ष थी।

इसके साथ ही मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता की पीठ, स्तन, कलाई और पैरों पर चोटों के निशान दर्ज किए गए थे। हाईकोर्ट ने इन चोटों को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना और कहा कि शरीर पर मिले हिंसा के निशान उसकी गवाही की पुष्टि करते हैं।

अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता को झूठा फंसाए जाने की दलील के समर्थन में बचाव पक्ष कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखकर क्या संदेश दिया?

सभी तथ्यों, गवाहियों और मेडिकल साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने आरोपियों को गैंगरेप के अपराध में दोषी ठहराने में कोई गलती नहीं की थी। इसके बाद अदालत ने सभी अपीलें खारिज कर दीं और चारों आरोपियों की 20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी।

इस फैसले का अहम पहलू यह है कि अदालत ने शिकायत दर्ज कराने में देरी, आरोपियों के नाम तत्काल नहीं बता पाने और मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिलने जैसे तथ्यों को अलग-अलग देखकर फैसला नहीं किया। इसके बजाय पीड़िता की गवाही, उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों को समग्र रूप से परखा।

आम लोगों के लिए यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखता है। किसी आपराधिक मामले में केवल एक परिस्थिति के आधार पर पूरे बयान को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर उनकी विश्वसनीयता तय करनी होती है।