कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत का मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। दोनों नेताओं ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि हिरासत बढ़ाने के लिए कानून का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया गया और जमानत देने के लिए तैयार लोगों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका भी नहीं मिला। दोनों पक्षों के बीच विवाद का केंद्र शांति बनाए रखने के लिए भरे गए बॉन्ड और जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने की कथित कोशिश है।
हाईकोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग, हिरासत बढ़ाने पर उठाए सवाल
सौरव दास और आशुतोष रांका ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। उनके वकील के मुताबिक, मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की जा रही है।
याचिका में कहा गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135(3) के तहत हिरासत बढ़ाने की शक्ति का इस्तेमाल उचित तरीके से नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि उन्हें बॉन्ड पूरा न कर पाने के आधार पर हिरासत में रखा गया, जबकि 19 अक्टूबर को उनकी ओर से पेश किए गए जमानतदार कानून के मुताबिक थे।
दोनों नेताओं का दावा है कि उनके पास दो अन्य जमानतदार भी मौजूद थे। इसके अलावा, दो और लोग विधिवत भरे हुए बॉन्ड और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद (FDR) के साथ जमानत देने के लिए तैयार थे। याचिका के अनुसार, इन लोगों को दस्तावेज पेश करने का अवसर नहीं दिया गया।
अब हाईकोर्ट के सामने यह सवाल है कि हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों और जमानत से जुड़े दस्तावेजों पर सही तरीके से विचार किया गया या नहीं।
जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने की कोशिश से कैसे बढ़ा विवाद?
इस मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुई थी। सौरव दास और आशुतोष रांका को एक हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ घोषित विरोध प्रदर्शनों से पहले, दोनों के खिलाफ BNSS की धारा 126 और 170 के तहत निवारक कार्रवाई की गई।
इसके बाद उनसे 50,000 रुपये का पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने का मुचलका भरवाया गया और उसी दिन छोड़ दिया गया।
हालांकि, आरोप है कि दोनों नेताओं ने निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने की कोशिश की। इसके बाद 14 अक्टूबर को उन्हें दोबारा हिरासत में ले लिया गया।
उसी दिन एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीणा ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 19 अक्टूबर को हुई, जहां उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई।
यह विवाद केवल दो नेताओं की हिरासत तक सीमित नहीं है। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड की शर्तों का कथित उल्लंघन होने पर प्रशासन किस आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकता है।
मजिस्ट्रेट ने क्यों खारिज की जमानत की दलील?
19 अक्टूबर के आदेश में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने कहा कि दोनों नेताओं ने जानबूझकर बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया और तत्काल शांति भंग की।
आदेश में जांच अधिकारी की ओर से पेश किए गए तथ्यों का हवाला देते हुए यह आशंका जताई गई कि दोनों नेता ऐसी जगहों पर बार-बार विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं, जहां इसकी अनुमति नहीं होती। मजिस्ट्रेट के मुताबिक, पुलिस के रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों को देखते हुए दोनों नेताओं का यह भरोसा दिलाना पर्याप्त नहीं था कि वे भविष्य में ऐसा दोबारा नहीं करेंगे।
अदालत ने नई जमानतें पेश करने का निर्देश भी दिया। आदेश के अनुसार, पहले पेश किए गए जमानत दस्तावेजों में कुछ खामियां थीं। बॉन्ड पर लगी तस्वीरों और जमानतदारों के आधार कार्ड में अंतर पाया गया। इसके अलावा, पूछताछ के दौरान जमानतदार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने इन आधारों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि हिरासत बढ़ाने का आदेश जांच अधिकारी की अर्जी में दिए गए तथ्यों पर आधारित था। उनका यह भी तर्क है कि जिस स्थान पर विरोध प्रदर्शन किया गया, वहां प्रदर्शन पर रोक की स्थिति को लेकर कानूनी सवाल उठते हैं और इसे सीधे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए।
अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें
सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर आगे की सुनवाई में हिरासत बढ़ाने के आदेश और जमानतदारों से जुड़े विवाद पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल, याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी है; केवल याचिका दाखिल होने से हिरासत का आदेश अपने आप रद्द नहीं होता।
इस मामले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें विरोध प्रदर्शन, निषेधाज्ञा, शांति बनाए रखने के बॉन्ड और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल एक साथ सामने आए हैं। आम नागरिकों के लिए भी यह मामला समझना जरूरी है कि किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान लागू प्रतिबंधों का उल्लंघन करने का आरोप लगने पर निवारक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन ऐसी कार्रवाई और हिरासत की वैधता संबंधित कानूनी प्रावधानों तथा उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तय होती है।
अब आगे की कानूनी प्रक्रिया से यह स्पष्ट होगा कि दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाने के आदेश में उठाई गई आपत्तियों पर हाईकोर्ट क्या रुख अपनाता है।



