आवारा कुत्तों के हमलों पर हाईकोर्ट सख्त, लखनऊ और प्रयागराज में चिह्नित होंगे हॉटस्पॉट, एक महीने में कार्रवाई के निर्देश

आवारा कुत्तों के हमलों पर हाईकोर्ट सख्त, लखनऊ और प्रयागराज में चिह्नित होंगे हॉटस्पॉट, एक महीने में कार्रवाई के निर्देश

लखनऊ और प्रयागराज में आवारा कुत्तों के हमलों से लोगों को राहत दिलाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने दोनों शहरों के नगर आयुक्तों को उन इलाकों की पहचान करने का निर्देश दिया है, जहां कुत्तों के काटने की घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं। ऐसे स्थानों पर खास निगरानी रखी जाएगी और बार-बार हमला करने वाले या आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले कुत्तों को मानवीय तरीके से पकड़कर निर्धारित पशु चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाया जाएगा। कोर्ट ने पिछले तीन वर्षों में हुई घटनाओं का रिकॉर्ड भी मांगा है। इसके साथ ही अस्पतालों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों, बाजारों और पार्कों जैसे सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा की समीक्षा करने को कहा गया है। पूरी प्रक्रिया एक महीने में पूरी करनी होगी।

तीन साल का रिकॉर्ड खंगालेगा नगर निगम, इन इलाकों पर रहेगी नजर

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने 1 अक्टूबर को ये निर्देश दिए थे। मामला आवारा कुत्तों और उनके काटने की घटनाओं से जुड़ा है। अदालत ने यह कार्रवाई स्वतः संज्ञान के तहत शुरू की गई कार्यवाही में की है, जिसका संबंध सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन से है।

कोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज के नगर आयुक्तों से कहा है कि वे पिछले तीन वर्षों में कुत्तों के काटने की घटनाओं का सालवार और क्षेत्रवार ब्योरा तैयार करें। इसमें नगर निगम में दर्ज शिकायतों और पशु चिकित्सा रिकॉर्ड को भी शामिल करना होगा।

रिपोर्ट से यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन इलाकों में ऐसी घटनाएं बार-बार हुई हैं और कहां इनकी संख्या बढ़ने के संकेत मिले हैं। अधिकारियों को अब तक उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए अदालत में हलफनामा भी दाखिल करना होगा।

अदालत ने साफ किया कि सिर्फ कागजों पर कार्रवाई दिखाना पर्याप्त नहीं है। यह भी जांचना जरूरी है कि प्रशासन की योजनाएं जमीन पर किस हद तक लागू हुई हैं और उनसे लोगों को वास्तविक राहत मिली है या नहीं।

अस्पताल, स्कूल और रेलवे स्टेशन भी होंगे जांच के दायरे में

हाईकोर्ट ने नगर आयुक्तों को निर्देश दिया है कि रिकॉर्ड के आधार पर पहचाने गए हॉटस्पॉट के अलावा निरीक्षण के लिए कम से कम 30 अन्य स्थान भी चुने जाएं। इनमें बड़े अस्पताल, स्कूल, रेलवे स्टेशन, बाजार, पार्क और लोगों की आवाजाही वाले दूसरे सार्वजनिक स्थल शामिल हो सकते हैं।

निरीक्षण केवल किसी संस्थान के मुख्य परिसर तक सीमित नहीं रहेगा। उसके आसपास की सड़कों और वहां पहुंचने वाले रास्तों की भी जांच की जाएगी। इसका उद्देश्य उन जगहों पर संभावित खतरे को समझना है, जहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग आते-जाते हैं।

हर चिह्नित स्थान पर नगर निगम और पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों की टीम तैनात की जाएगी। टीम को वहां मौजूद कुत्तों की अनुमानित संख्या दर्ज करनी होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि संख्या का आकलन किस तारीख को और किस तरीके से किया गया।

अधिकारियों को बार-बार हमला करने वाले और आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले कुत्तों की पहचान करनी होगी। पिछले तीन वर्षों में उनकी नसबंदी, टीकाकरण और उन्हें हटाने के लिए किए गए प्रयासों का रिकॉर्ड भी देना होगा। जहां उपलब्ध हो, वहां संबंधित कुत्तों की संख्या भी बतानी होगी।

कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया के लिए एक महीने की समयसीमा तय की है। नगर आयुक्तों को 5 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई से पहले अनुपालन हलफनामे भी दाखिल करने होंगे।

कुत्तों को पकड़ने से लेकर इलाज तक, कोर्ट ने तय की प्रक्रिया

अदालत ने स्पष्ट किया है कि कुत्तों को हटाने की कार्रवाई मानवीय तरीके से होनी चाहिए। पकड़े गए कुत्तों को निर्धारित एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) केंद्र या पशु चिकित्सा सुविधा केंद्र ले जाया जाए। वहां उनकी चिकित्सकीय जांच, जरूरी इलाज, नसबंदी और टीकाकरण किया जाए।

जिन कुत्तों में आक्रामक व्यवहार दिखाई देता है या जिनके रेबीज से संक्रमित होने का संदेह है, उनका अलग से आकलन करना होगा। जरूरत के मुताबिक उन्हें अन्य कुत्तों से अलग रखकर निगरानी और देखभाल की व्यवस्था की जाएगी।

अदालत ने रिकॉर्ड रखने पर भी जोर दिया है। अधिकारियों को प्रत्येक कुत्ते की पहचान, उसे किस स्थान से पकड़ा गया, कहां ले जाया गया और उसके संबंध में क्या कार्रवाई हुई, इसका पूरा ब्योरा रखना होगा।

रिपोर्ट में अदालत के आदेश के बाद हटाए गए कुत्तों का अलग विवरण देना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि बार-बार हमला करने वाले या आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले कुत्ते फिलहाल कहां रखे गए हैं और उनके साथ क्या प्रक्रिया अपनाई गई है।

कोर्ट ने प्रशासन से मौजूदा व्यवस्थाओं की कमियों का विवरण भी मांगा है। इसमें कर्मचारियों की कमी, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता, जरूरी उपकरणों और प्रभावी तरीकों से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। ABC केंद्रों की क्षमता, कर्मचारियों की योग्यता, आगे के इलाज और कुत्तों को कानूनी तरीके से रखने या छोड़ने में आने वाली चुनौतियों की जानकारी भी देनी होगी।

‘लखनऊ मॉडल’ पर भी मांगा जवाब, 5 नवंबर को अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर आयुक्त को विशेष रूप से एक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। इसमें बताया जाएगा कि चर्चित ‘लखनऊ मॉडल’ कैसे काम करता है, जरहारा प्रशिक्षण केंद्र की मौजूदा भूमिका क्या है और इस मॉडल की सफलता के दावों के समर्थन में कौन से परिणाम उपलब्ध हैं। साथ ही, ऐसी कौन-सी व्यवस्थाएं हैं जिन्हें दूसरे शहरों में भी लागू किया जा सकता है।

प्रशासन को अपनी कार्ययोजना में यह भी बताना होगा कि हर चिह्नित इलाके में कितने कुत्ते मौजूद हैं, कितने आक्रामक कुत्तों को हटाने की कार्रवाई बाकी है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। सार्वजनिक संस्थानों और उनके आसपास के क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने की योजना भी पेश करनी होगी।

इस काम में मुख्य चिकित्सा अधिकारियों, नगर निगम, पशुपालन विभाग, संबंधित संस्थानों के प्रमुखों और नोडल अधिकारियों को सहयोग करने का निर्देश दिया गया है। जिलाधिकारियों को भी अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बनाने और काम में आने वाली बाधाओं को दूर करने की जिम्मेदारी दी गई है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स, 2023 और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया की मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुरूप होने चाहिए। लखनऊ और प्रयागराज में चलने वाला यह विशेष अभियान पूरे उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन की जिम्मेदारी को कम नहीं करेगा।

अदालत के सहयोगी यानी एमिक्स क्यूरी को राज्य सरकार, केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों तथा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की ओर से दाखिल हलफनामों और दस्तावेजों की समीक्षा करने को कहा गया है। उन्हें अदालत को यह बताने में मदद करनी होगी कि अब तक निर्देशों का कितना पालन हुआ है और क्या आगे अतिरिक्त आदेश देने की जरूरत है।

अब 5 नवंबर की सुनवाई अहम होगी। उस दिन अदालत के सामने दोनों शहरों में उठाए गए कदमों का विवरण रखा जाएगा। आम लोगों के लिए इस पूरी प्रक्रिया का महत्व इस बात में है कि प्रशासन की कार्रवाई कितनी प्रभावी रहती है और क्या इससे सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों के हमलों के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।