महाराष्ट्र MLC चुनाव में BJP की बढ़ी टेंशन! शिंदे की बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों से महायुति के वोट बंटने का खतरा

महाराष्ट्र MLC चुनाव में BJP की बढ़ी टेंशन! शिंदे की बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों से महायुति के वोट बंटने का खतरा

महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों पर हो रहे चुनाव में बीजेपी और महायुति गठबंधन के सामने अपनी ही राजनीतिक ताकत बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ गठबंधन के भीतर उम्मीदवारों को लेकर मतभेद सामने आए हैं, तो दूसरी तरफ बागी और निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना रहे हैं। पुणे में एकनाथ शिंदे की शिवसेना के फैसले से बीजेपी के उम्मीदवार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जबकि अमरावती में भी बागियों के कारण गठबंधन के वोट बंटने की आशंका है। नागपुर और मराठवाड़ा में भी मुकाबले के समीकरण आसान नहीं हैं। मतदान सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक निर्धारित है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी और महायुति अपने समर्थकों को एकजुट रख पाएंगे या अंदरूनी खींचतान का फायदा विपक्षी उम्मीदवारों को मिलेगा?

पुणे में बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती, तीन उम्मीदवारों के बीच मुकाबला

पुणे स्नातक सीट पर बीजेपी ने डॉ. स्मिता जाधव को मैदान में उतारा है। उनके सामने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की हर्षदा देशमुख-जाधव और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सुनील मोदी हैं।

हर्षदा देशमुख-जाधव पूर्व आईएएस अधिकारी प्रभाकर देशमुख की बेटी हैं। वहीं, सुनील मोदी कोल्हापुर महानगरपालिका में कांग्रेस के स्वीकृत नगरसेवक रह चुके हैं और पहले शिवसेना के शहर प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

इस सीट पर मुकाबला इसलिए अहम है, क्योंकि सुनील मोदी के चुनाव लड़ने से महाविकास आघाड़ी के वोटों पर असर पड़ने की संभावना है। अगर विपक्षी खेमे के मतदाता अलग-अलग उम्मीदवारों के पक्ष में बंटते हैं, तो इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है। हालांकि, इसका उलटा असर भी संभव है और अंतिम तस्वीर मतदान के बाद ही साफ होगी।

पुणे शिक्षक सीट पर भी बीजेपी के लिए स्थिति आसान नहीं है। पार्टी ने कौस्तुभ गावडे को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस के मौजूदा विधायक जयंत आसगावकर चुनाव लड़ रहे हैं।

शिवसेना ने पहले मंगेश चिवटे को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में उनका नाम वापस ले लिया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने निर्दलीय प्रत्याशी सचिन सानप को समर्थन देने की घोषणा की। इस फैसले ने गठबंधन के भीतर मतभेदों को सामने ला दिया है।

राष्ट्रीय समाज पार्टी के टिकट पर पूर्व विधायक दत्तात्रय सावंत भी चुनाव मैदान में हैं। चार उम्मीदवारों के बीच मुकाबले में वोटों का बंटवारा नतीजे पर असर डाल सकता है।

अमरावती में बागियों ने बढ़ाई महायुति की चिंता

अमरावती शिक्षक सीट पर भी महायुति के सामने अपने वोटों को एकजुट रखने की चुनौती है। बीजेपी के बागी उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे गठबंधन के आधिकारिक प्रत्याशी को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

इस सीट पर कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के उम्मीदवारों के अलावा विभिन्न शिक्षक संगठनों से जुड़े प्रत्याशी भी मुकाबले में हैं। महाराष्ट्र राज्य शिक्षक परिषद और मेस्टा ने बीजेपी के बागी उम्मीदवार का समर्थन किया है। दूसरी ओर, नूटा ने कांग्रेस के उम्मीदवार समेत चार शिक्षक प्रत्याशियों को समर्थन देने की घोषणा की है।

कांग्रेस के उम्मीदवार हर्षवर्धन देशमुख की बेटी हैं। बीजेपी ने उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया है। ऐसे में चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षक संगठनों का समर्थन और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ भी अहम भूमिका निभा सकती है।

महायुति के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर पार्टी के असंतुष्ट नेता और समर्थक अलग उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करते हैं, तो गठबंधन की चुनावी रणनीति कमजोर पड़ सकती है।

नागपुर और मराठवाड़ा में भी मुकाबला दिलचस्प

नागपुर स्नातक सीट पर बीजेपी के सुधाकर कोहळे और कांग्रेस के वंजारी के बीच मुख्य मुकाबला है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रो. अनिल सोले ने चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया है, लेकिन मतपत्र पर उनका नाम बने रहने की जानकारी दी गई है।

ऐसी स्थिति में उनके समर्थकों का रुख महत्वपूर्ण हो सकता है। बीजेपी की कोशिश रहेगी कि उसके परंपरागत मतदाता एकजुट रहें और वोटों का नुकसान न हो। वहीं, कांग्रेस के सामने भी अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने की चुनौती है।

मराठवाड़ा स्नातक सीट पर सतीश चव्हाण की उम्मीदवारी ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं। लगातार तीन बार जीत चुके चव्हाण इस बार महायुति के उम्मीदवार हैं।

उनके सामने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के डॉ. प्रतापसिंह पाटील और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के दिलीप घुगे हैं। महाविकास आघाड़ी के दोनों दलों के उम्मीदवार मैदान में होने के कारण विपक्षी वोटों के बंटवारे की संभावना है। इससे महायुति को फायदा मिल सकता है, लेकिन वास्तविक परिणाम मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।

वोटों का गणित तय करेगा नतीजा, बगावत कितनी पड़ेगी भारी?

इन पांच सीटों के चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या के साथ-साथ गठबंधन के भीतर तालमेल भी निर्णायक साबित हो सकता है। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में वोट दे सकते हैं। इसलिए केवल शुरुआती वोटों का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि मतों के हस्तांतरण और पसंद के क्रम का भी महत्व हो सकता है।

चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को पैसे देने के आरोप भी सामने आए हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि को लेकर उपलब्ध जानकारी में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

बीजेपी और महायुति के लिए यह चुनाव संगठनात्मक एकजुटता की परीक्षा भी है। अगर बागी उम्मीदवार आधिकारिक प्रत्याशियों के वोट काटते हैं, तो इसका असर नतीजों पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, विपक्षी दलों के बीच उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने से उनके मतों के बंटने की संभावना भी बनी हुई है।

फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि महायुति अपने भीतर के मतभेदों को कितना नियंत्रित कर पाती है। पांचों सीटों पर नतीजे तय करेंगे कि गठबंधन की चुनावी रणनीति कितनी प्रभावी रही और बागियों का असर कितना गहरा पड़ा।