देश में चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की कार्यप्रणाली को लेकर एक नई कानूनी बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज की स्वतंत्र जांच कराने और इसके लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है। याचिका में चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक अपील के इस्तेमाल पर रोक लगाने से लेकर EVM की तकनीक की जांच और मतदाता सूची में गड़बड़ियों की समीक्षा करने तक कई मुद्दे उठाए गए हैं। हालांकि, ये सभी याचिकाकर्ता की मांगें हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट का फैसला या चुनाव आयोग के खिलाफ साबित हुई अनियमितताएं नहीं माना जाना चाहिए।
चुनाव आयोग की स्वतंत्र जांच की मांग, पूर्व CJI की अध्यक्षता में बने कमेटी
वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की है। इसमें मांग की गई है कि चुनाव आयोग के कामकाज में संभावित कमियों की पड़ताल के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश से कराने का प्रस्ताव रखा गया है।
याचिका का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ फैसला हासिल करना नहीं बताया गया है। इसमें किसी चुनाव के नतीजे को भी चुनौती नहीं दी गई है। इसके बजाय चुनाव व्यवस्था में सुधार और उसकी निष्पक्षता को मजबूत करने के लिए संस्थागत स्तर पर जांच की मांग की गई है।
इस मामले का महत्व इसलिए है क्योंकि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। मतदाता सूची से लेकर मतदान और मतगणना तक, हर चरण में पारदर्शिता को लेकर उठने वाले सवाल सीधे मतदाताओं के विश्वास से जुड़े होते हैं।
फिलहाल, याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख सामने आना बाकी है। समिति बनाने या जांच के दायरे को लेकर कोई फैसला होने की जानकारी दिए गए विवरण में नहीं है।
चुनाव प्रचार में धर्म और सांप्रदायिक अपील पर रोक लगाने की मांग
याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की मांग भी की गई है कि चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान, धार्मिक प्रतीकों, सांप्रदायिक अपील, संप्रदाय आधारित पहचान और भड़काऊ भाषणों के इस्तेमाल पर प्रभावी रोक लगाई जाए।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहनी चाहिए और भविष्य में चुनावी सुधारों के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक अपील से जुड़े मुद्दे चुनाव प्रचार के दौरान संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे में याचिका में चुनाव आयोग की भूमिका और उसके कामकाज की समीक्षा की मांग की गई है।
इस मांग का संबंध मतदाताओं को चुनावी मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अवसर देने से भी है। हालांकि, याचिका में की गई मांग और अदालत द्वारा स्वीकार किए गए किसी कानूनी निर्देश के बीच अंतर समझना जरूरी है। अभी इन प्रस्तावों को अदालत का आदेश नहीं माना जा सकता।
महाराष्ट्र की मतदाता सूची में 2.70 लाख से ज्यादा नामों की उम्र पर सवाल
याचिका में महाराष्ट्र की मतदाता सूची के मसौदे से जुड़ी एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जन्म वर्ष से संबंधित तकनीकी गड़बड़ी के कारण 2,70,313 मतदाताओं की उम्र 101 से 150 वर्ष के बीच दिखाई गई थी।
याचिका में इस उदाहरण के जरिए मतदाता सूची तैयार करने और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें चिंता जताई गई है कि अगर मतदाता सूची में बड़े बदलाव पर्याप्त नियमों और सुरक्षा उपायों के बिना किए जाते हैं, तो वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम छूटने या हटने का जोखिम हो सकता है।
आम मतदाता के लिए मतदाता सूची में सही नाम और विवरण होना बेहद जरूरी है। किसी पात्र व्यक्ति का नाम सूची में नहीं होने पर उसे मतदान के अधिकार का इस्तेमाल करने में परेशानी हो सकती है। इसलिए सूची में संशोधन के दौरान सटीकता और पारदर्शिता महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, रिपोर्ट में बताई गई तकनीकी गड़बड़ी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि सभी संबंधित प्रविष्टियां गलत थीं या पात्र मतदाताओं के नाम वास्तव में हटा दिए गए। इन आशंकाओं और तथ्यों की पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक जानकारी की जांच जरूरी होगी।
EVM की तकनीक और नियमों की भी हो स्वतंत्र समीक्षा
याचिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की तकनीक, उनकी कार्यप्रणाली और उनसे जुड़े नियमों की विस्तृत जांच कराने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता चाहता है कि यह परखा जाए कि भारतीय EVM अंतरराष्ट्रीय मानकों और तकनीकी सुरक्षा के उच्च स्तर पर खरी उतरती हैं या नहीं।
इस मांग के जरिए चुनावी तकनीक की विश्वसनीयता और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा का मुद्दा उठाया गया है। हालांकि, याचिका में EVM की जांच की मांग किए जाने को मशीनों में गड़बड़ी साबित होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
खबर में चुनाव आयोग के भीतर चुनाव संबंधी फैसलों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच संभावित मतभेदों का भी जिक्र है। लेकिन इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। केवल ऐसी खबरों के आधार पर किसी संस्थागत अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट याचिका में उठाए गए मुद्दों पर क्या रुख अपनाता है। यदि अदालत जांच या विशेषज्ञ समिति के गठन पर विचार करती है, तो उसके दायरे और शर्तों का महत्व होगा। फिलहाल, याचिका में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और EVM की समीक्षा से जुड़ी मांगें रखी गई हैं। किसी जांच समिति के गठन या आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
