ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान को कानूनी मान्यता देने वाले प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई कानूनी बहस शुरू हो गई है। महिलाओं के अधिकारों से जुड़े संगठन Women’s Declaration International India ने याचिका दायर कर सवाल उठाया है कि क्या किसी व्यक्ति को जन्म के समय निर्धारित जैविक सेक्स से अलग जेंडर पहचान के आधार पर आधिकारिक दस्तावेजों में बदलाव कराने के साथ महिलाओं के लिए तय सभी कानूनी अधिकार और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए? संगठन ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 और इससे जुड़े नियमों को चुनौती दी है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले पर दोबारा विचार करने और उसकी व्याख्या स्पष्ट करने की मांग की है।
इस मामले में बहस केवल जेंडर सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं है। महिला आरक्षण, सरकारी नौकरियों, खेल प्रतियोगिताओं, जेलों और महिलाओं के लिए निर्धारित अलग सुविधाओं से जुड़े कई अहम सवाल भी सामने आए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला, 2026 के संशोधन को भी चुनौती
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह मामला आया। अदालत ने इसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम में 2026 के संशोधन को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
याचिकाकर्ता संगठन ने 2019 के कानून की धारा 7 के साथ 2020 के नियमों के नियम 7 और संबंधित प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। इन प्रावधानों के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी जेंडर पहचान के अनुसार आधिकारिक दस्तावेजों में बदलाव कराने का रास्ता मिलता है।
संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित सिब्बल ने अदालत में स्पष्ट किया कि उनकी याचिका ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के खिलाफ नहीं है। उनका कहना था कि जेंडर पहचान के अधिकार को मान्यता देते समय जैविक महिलाओं के लिए बनाए गए विशेष कानूनी संरक्षणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
सिब्बल ने दलील दी कि एक वर्ग को अधिकार देने की प्रक्रिया में दूसरे वर्ग के लिए निर्धारित संवैधानिक अधिकार और सुविधाएं प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, ‘आप सुरंग के दूसरे छोर से रोशनी दिखा रहे हैं।’
जैविक सेक्स और जेंडर पहचान में अंतर का मुद्दा क्यों उठा?
याचिका का सबसे अहम आधार जैविक सेक्स और जेंडर पहचान के बीच अंतर है। संगठन का तर्क है कि किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान और जन्म के समय निर्धारित जैविक सेक्स दो अलग अवधारणाएं हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान चुनने और उसे व्यक्त करने का अधिकार जरूर होना चाहिए, लेकिन केवल पहचान या सर्जरी के आधार पर जैविक महिलाओं के लिए निर्धारित सभी कानूनी लाभ अपने आप मिलना उचित नहीं है।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि मेडिकल या सर्जिकल प्रक्रियाओं से शरीर के अंगों और बाहरी लैंगिक विशेषताओं में बदलाव संभव है, लेकिन इससे व्यक्ति की क्रोमोसोम और आनुवंशिक संरचना नहीं बदलती।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने याचिका में उठाए गए सवाल को समझाते हुए कहा कि यदि जन्म के समय किसी व्यक्ति को पुरुष निर्धारित किया गया है, लेकिन वह अपनी पहचान महिला के रूप में रखता है, तो क्या उसे जैविक महिलाओं के लिए निर्धारित समान कानूनी दर्जा दिया जाना चाहिए? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर विचार जरूरी है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मुख्य याचिकाओं पर सरकार की ओर से जवाब तैयार किया जा रहा है। मौजूदा याचिका में उठाए गए मुद्दों को भी जवाब में शामिल किया जाएगा।
महिला आरक्षण से लेकर खेल प्रतियोगिताओं तक, कई फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ता ने अपनी बात के समर्थन में अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसलों और प्रशासनिक निर्णयों का भी उल्लेख किया है। संगठन का कहना है कि जेंडर पहचान के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षित पदों और सुविधाओं में भागीदारी को लेकर पहले भी कई कानूनी विवाद सामने आ चुके हैं।
याचिका में जिन मामलों का जिक्र किया गया है, उनमें प्रमुख हैं:
– Anjali Guru Sanjana Jaan v. State of Maharashtra: बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया गया है, जिसमें महिला के रूप में पहचान रखने वाले जन्म के समय पुरुष निर्धारित व्यक्ति को महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायत सीट से चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी।
– केरल राज्य निर्वाचन आयोग का फैसला: नवंबर 2025 में अमाया प्रसाद और अरुणिमा एम. कुरुप नाम की दो ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानीय निकाय सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति देने वाले निर्णय का उल्लेख किया गया है।
– Hina Haneefa v. State of Kerala: केरल हाईकोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर महिला को राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) की गर्ल्स डिवीजन में शामिल होने की अनुमति दी थी।
– S. Mani v. The Additional Chief Secretary to Government: मद्रास हाईकोर्ट के उस मामले का हवाला दिया गया है, जिसमें महिला के रूप में पहचान दर्ज कराने वाले व्यक्ति को सरकारी अस्पताल में महिला नर्सिंग असिस्टेंट के रिक्त पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।
– Anamika v. State of Kerala: केरल हाईकोर्ट ने अलग ट्रांसजेंडर श्रेणी नहीं होने की स्थिति में महिला के रूप में पहचान रखने वाले व्यक्ति को जिला स्तरीय जूडो प्रतियोगिता के महिला वर्ग में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी।
याचिकाकर्ता ने इन उदाहरणों के जरिए महिला आरक्षण, सरकारी भर्ती, खेलों में भागीदारी और महिलाओं के लिए निर्धारित अलग व्यवस्थाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का मुद्दा उठाया है।
संविधान के पांच अनुच्छेदों का हवाला, NALSA फैसले पर भी सवाल
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 19(1)(a) और 21 के उल्लंघन का दावा किया गया है। संगठन का कहना है कि चुनौती दिए गए कानूनी प्रावधानों से जैविक महिलाओं के लिए निर्धारित विशेष अधिकारों और सुरक्षा उपायों के दायरे को लेकर अस्पष्टता पैदा हो सकती है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक फैसले National Legal Services Authority v. Union of India (NALSA) का भी जिक्र किया गया है। इस फैसले में अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर पहचान और उसे कानूनी मान्यता देने के अधिकार को स्वीकार किया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क है कि उस फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि अपनी पहचान के आधार पर किसी दूसरे सेक्स के लिए निर्धारित हर कानूनी लाभ और संरक्षण भी स्वतः मिल जाएगा।
सुनवाई के दौरान प्रजनन क्षमता, महिला खेल प्रतियोगिताओं, महिला जेलों में रहने की व्यवस्था और व्यक्तिगत तलाशी जैसे संवेदनशील विषय भी चर्चा में आए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। एक तरफ ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान और उनके कानूनी अधिकारों का संरक्षण है, तो दूसरी तरफ जैविक महिलाओं के लिए निर्धारित अधिकारों और विशेष सुविधाओं का सवाल है। अदालत इन दोनों के बीच कानूनी संतुलन को किस तरह देखती है, इस पर आगे की सुनवाई में तस्वीर साफ हो सकती है।



