सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिया सख्त संदेश, सिर्फ वीडियो कॉल से नहीं चलेगा काम
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि भारत और रूस के बीच इस मुद्दे पर हाल ही में बातचीत हुई है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई चर्चा के बाद एक आधिकारिक पत्र यानी ‘नोट वर्बेल’ भी अदालत में सीलबंद लिफाफे में पेश किया गया।
इस बातचीत में एक सुझाव यह सामने आया कि रूस में मौजूद बच्चे और भारत में रह रहे उसके पिता के बीच वीडियो कॉल कराई जा सकती है। इससे बच्चे की सुरक्षा और उसकी मौजूदा स्थिति का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था से संतुष्ट नजर नहीं आया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने साफ कहा कि वीडियो कॉल कराना एक अलग बात है, लेकिन असली सवाल यह है कि बच्चा अदालत की कस्टडी व्यवस्था से बाहर कैसे चला गया।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि जब बच्चा सुप्रीम कोर्ट की कस्टडी में था और उसे वापस लाने के आदेश दिए गए थे, तब उसे देश से बाहर ले जाना बेहद गंभीर मामला है। अदालत ने कहा कि सिर्फ वीडियो कॉल से जिम्मेदारी पूरी नहीं होगी। बच्चे को वापस भारत लाकर सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करना जरूरी है।
रूसी मां और भारतीय पिता के बीच कस्टडी विवाद कैसे पहुंचा सुप्रीम कोर्ट?
यह मामला एक रूसी महिला और भारतीय नागरिक के बेटे की कस्टडी से जुड़ा है। बच्चे की मां ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की थी। इस याचिका के जरिए बच्चे की कस्टडी दिलाने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मां और बेटे की मुलाकात भी कराई थी। जस्टिस दत्ता ने बताया कि उस मुलाकात के दौरान दोनों का व्यवहार कैसा रहा, इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। हालांकि, बाद में अदालत ने बच्चे को अपनी कस्टडी व्यवस्था के तहत ले लिया था।
अदालत के अलग-अलग आदेशों के मुताबिक, बच्चे की संयुक्त कस्टडी उसकी रूसी मां और भारतीय पिता के पास थी। लेकिन पिछले साल मामला उस समय गंभीर हो गया, जब आरोप लगा कि मां बच्चे को पिता की कस्टडी से लेकर नेपाल के रास्ते रूस चली गई।
खास बात यह है कि बच्चे का भारतीय पासपोर्ट पहले ही अदालत में जमा कराया जा चुका था। इसके बावजूद कथित तौर पर बच्चे को देश से बाहर ले जाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर पहले भी चिंता जताई थी और बच्चे को वापस लाने के निर्देश दिए थे।
दूतावास के अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल, एक साल से नहीं मिल रहा बच्चा
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने कहा कि अदालत पिछले करीब एक साल से बच्चे का पता लगाने और उसे वापस लाने की कोशिश कर रही है। अब तक उसकी वापसी नहीं हो पाई है।
अदालत को मिली ताजा जानकारी से संकेत मिलता है कि रूसी सरकार को मां और बच्चे के ठिकाने के बारे में जानकारी हो सकती है। जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि संभव है बच्चा सुरक्षित हाथों में हो, लेकिन इससे अदालत के आदेशों की अनदेखी का मुद्दा खत्म नहीं हो जाता।
इस मामले में रूसी वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों और भारतीय अधिकारियों की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं। अदालत को आशंका है कि देश से बाहर जाने के लिए फर्जी या जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। हालांकि, इन आरोपों और आशंकाओं की अंतिम पुष्टि होना अभी बाकी है।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि अदालत ने शुरुआत में मां के प्रति नरमी दिखाई थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस नरमी का फायदा उठाकर अदालत के आदेशों की अनदेखी की जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत सरकार को इस मामले को सर्वोच्च स्तर पर उठाना चाहिए। बच्चे की वापसी के लिए हर जरूरी कूटनीतिक और कानूनी प्रयास किए जाने चाहिए।
एक महीने बाद फिर होगी सुनवाई, भारत और रूस दोनों से कार्रवाई की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और रूसी पक्ष के बीच हुए आधिकारिक संवाद को सीलबंद लिफाफे में रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है।
अदालत चाहती है कि भारत और रूस दोनों सरकारें बातचीत में सामने आए निर्देशों के मुताबिक जरूरी कदम उठाएं। सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमन ने भी अदालत की चिंता और बच्चे को जल्द भारत वापस लाने की जरूरत से केंद्र सरकार को अवगत कराया।
बेंच ने कहा कि पहली नजर में याचिकाकर्ता का अदालत की अनुमति के बिना बच्चे को लेकर जाना न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने जैसा है। इसके अन्य गंभीर कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई महीने के अंत में तय की है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि भारत सरकार रूस के साथ बातचीत के जरिए बच्चे की वापसी सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाती है।
यह मामला केवल दो अभिभावकों के बीच कस्टडी की लड़ाई नहीं है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पार बच्चों की कस्टडी से जुड़े विवाद कितने जटिल हो सकते हैं। ऐसे मामलों में अदालत के आदेशों का पालन और बच्चे की सुरक्षा दोनों बेहद अहम हो जाते हैं।
Case Title: Viktoriia Basu Versus The State of West Bengal and Others


