परिसीमन पर संसद में टकराव: अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना, बोले—1971 से रोक की जिम्मेदार वही

परिसीमन पर संसद में टकराव: अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना, बोले—1971 से रोक की जिम्मेदार वही

लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर विस्तार से बात करते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और कहा कि देश में दशकों तक परिसीमन लागू न होने की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस रही है। यह बहस सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर प्रतिनिधित्व और वोट की ताकत पर पड़ सकता है।

1971 से रुका परिसीमन: शाह ने कांग्रेस को ठहराया जिम्मेदार

अमित शाह ने सदन में कहा कि 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिसीमन प्रक्रिया को रोक दिया था। उस समय लोकसभा सीटों की संख्या 525 से बढ़ाकर 543 की गई, लेकिन इसके बाद सीटों को फ्रीज कर दिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया कि आपातकाल के दौरान लाए गए कानून के जरिए इस प्रक्रिया को लंबे समय तक रोक दिया गया, जिससे बढ़ती आबादी के बावजूद सीटों में वृद्धि नहीं हो सकी। शाह के मुताबिक, कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए भी और विपक्ष में रहते हुए भी इस मुद्दे पर हमेशा नकारात्मक रुख अपनाया।

‘आज भी विरोध क्यों?’—सरकार का विपक्ष से सवाल

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि जब सरकार अब परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तब भी कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। उनके अनुसार, यह विरोध केवल प्रक्रिया का नहीं, बल्कि इसके मूल उद्देश्य का है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो दल परिसीमन का विरोध कर रहे हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों में संभावित बढ़ोतरी का भी विरोध कर रहे हैं।

वोटर असंतुलन का तर्क: क्यों जरूरी है परिसीमन

अमित शाह ने अपने भाषण में एक अहम तथ्य रखा। उन्होंने बताया कि देश के कई संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अत्यधिक बढ़ चुकी है। कुछ सीटों पर 39 लाख तक वोटर हैं, जबकि 127 सीटों पर 20 लाख से ज्यादा मतदाता हैं।

ऐसे में एक सांसद के लिए सभी मतदाताओं तक पहुंचना और उनकी समस्याओं का समाधान करना बेहद कठिन हो जाता है। शाह का तर्क है कि परिसीमन से सीटों का पुनर्गठन होगा और हर वोट का महत्व समान हो सकेगा।

वाजपेयी सरकार का जिक्र और वर्तमान संदर्भ

शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 2001 में वाजपेयी सरकार ने परिसीमन पर 2026 तक रोक बढ़ाई थी, क्योंकि उस समय भी राजनीतिक सहमति बनना मुश्किल था।

साथ ही, उन्होंने कहा कि अब सरकार ने जातिवार गणना के साथ जनगणना शुरू करने का निर्णय लिया है, ताकि भविष्य की नीतियां अधिक सटीक और समावेशी बन सकें।

यह पूरा विवाद केवल एक विधायी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि इससे यह तय होगा कि आने वाले वर्षों में देश के नागरिकों का प्रतिनिधित्व किस तरह से होगा। एक ओर सरकार इसे ‘वोट की बराबरी’ का कदम बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसके राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले समय में और भी गहराने की संभावना है।