होर्मुज संकट गहराया, भारतीय जहाजों पर हमला—क्या 60 दिन का तेल भंडार बचाएगा भारत?

होर्मुज संकट गहराया, भारतीय जहाजों पर हमला—क्या 60 दिन का तेल भंडार बचाएगा भारत?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। जिस रास्ते से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है, वहां हालात तेजी से बिगड़ते दिख रहे हैं। ईरान द्वारा जहाजों पर फायरिंग की घटनाओं ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार को झटका दिया है, बल्कि भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए भी चुनौती खड़ी कर दी है।

भारत के दो व्यापारिक जहाजों के इस तनाव की चपेट में आने के बाद सवाल उठ रहा है—अगर संकट लंबा चला तो क्या भारत के पास पर्याप्त तैयारी है?

होर्मुज में तनाव: जहाजों पर हमले से बढ़ी चिंता

शुक्रवार को जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने का संकेत दिया था, तब कुछ राहत जरूर मिली थी। लेकिन अगले ही दिन हालात पलट गए। अमेरिका की ओर से ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी जारी रखने के फैसले के बाद ईरान ने सख्त प्रतिक्रिया दी।

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने न सिर्फ मार्ग को फिर से बंद किया, बल्कि गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दी कि उन्हें “दुश्मन का सहयोगी” माना जाएगा। इसी दौरान एक टैंकर और एक कंटेनर जहाज पर हमले की खबर सामने आई, जिनमें भारतीय जहाज भी शामिल थे।

भारत का प्लान-B: 60 दिन का ऊर्जा सुरक्षा कवच

इस संकट के बीच भारत ने अपनी तैयारियों का खाका सामने रखा है। सरकार के पास फिलहाल कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल (ATF) का 60 दिनों से ज्यादा का भंडार मौजूद है। इसके अलावा एलएनजी का लगभग 50 दिन और एलपीजी का करीब 40 दिन का स्टॉक सुरक्षित है।

यह भंडार केवल सतही स्टोरेज ही नहीं, बल्कि भूमिगत रणनीतिक रिजर्व में रखे गए स्टॉक को भी शामिल करता है। यानी तत्काल आपूर्ति संकट से निपटने के लिए देश के पास एक मजबूत बैकअप मौजूद है।

आयात रणनीति में बदलाव: नए सप्लायर की तलाश

भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, जिसमें सऊदी अरब और यूएई का बड़ा योगदान है। लेकिन होर्मुज पर निर्भरता कम करने के लिए अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिकी देशों से भी आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

सरकार ने अप्रैल और मई 2026 के लिए आयात पहले ही सुरक्षित कर लिया है, जिससे फिलहाल किसी तात्कालिक संकट की आशंका कम हो गई है।

कूटनीतिक संतुलन और आगे की चुनौती

भारत ने अब तक कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभाई है। युद्ध की शुरुआत के बाद से कई भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से इस क्षेत्र से गुजर चुके हैं। तेहरान के साथ संवाद बनाए रखते हुए भारत ने अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश की है।

हालांकि, चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। होर्मुज में अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ रहा है। ब्रेंट क्रूड में उतार-चढ़ाव का मतलब है कि भारत में महंगाई और ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ सकती है।

फिलहाल भारत ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर काम कर रहा है। अगले दो महीने का भंडार राहत जरूर देता है, लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों पर पड़ सकता है।