कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी छवि को नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक वीडियोज के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने उनकी व्यक्तिगत पहचान के अधिकारों की रक्षा करते हुए महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करने का फैसला किया है। खासतौर पर उन फर्जी वीडियोज को ब्लॉक करने का निर्देश दिया गया है, जिनमें थरूर कथित रूप से पाकिस्तानी विदेश नीति की तारीफ करते दिखाए जा रहे हैं।
यह मामला आम नागरिकों के लिए भी अहम है क्योंकि आजकल सोशल मीडिया पर किसी भी व्यक्ति की आवाज और चेहरे का दुरुपयोग आसानी से हो रहा है। अगर知名 नेताओं की छवि को इस तरह से तोड़ा जा सकता है तो आम आदमी की सुरक्षा कैसे होगी, यह सवाल अब अदालतों के सामने भी आ रहा है।
थरूर के वकील ने कोर्ट में रखी ये दलीलें
थरूर की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील अमित सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि कुछ लोग बार-बार उनके मुवक्किल के चेहरे, आवाज और व्यक्तित्व का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। ये फर्जी वीडियो न सिर्फ थरूर की छवि खराब कर रहे हैं बल्कि देश की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सिब्बल ने यह भी कहा कि शशि थरूर एक देशभक्त नेता हैं। वे संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं और पूर्व विदेश राज्य मंत्री भी हैं। ऐसे में उनकी गलत छवि पेश करना सिर्फ व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि देश की विदेश नीति और स्थिति को प्रभावित करने वाला मुद्दा है। सूचना प्रौद्योगिकी नियमों और पुलिस शिकायत के बावजूद आपत्तिजनक कंटेंट बार-बार सामने आ रहा था। मेटा की ओर से कुछ सामग्री हटाई गई है, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
पर्सनैलिटी राइट्स का उल्लंघन, थरूर ने याचिका में क्या कहा?
अपनी याचिका में शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति उनके चेहरे, आवाज, हावभाव और शब्दावली का इस्तेमाल कर एआई और मशीन लर्निंग के जरिए बिल्कुल असली जैसे डीपफेक ऑडियो-विजुअल बनाए जा रहे हैं। इससे उनके व्यक्तित्व के अधिकारों और निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन हो रहा है।
कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया और पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अंतरिम राहत देने का संकेत दिया। यह फैसला सिर्फ थरूर तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
डीपफेक का बढ़ता खतरा और कानूनी रास्ता
आज के डिजिटल युग में डीपफेक वीडियो एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। ये न सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाते हैं बल्कि सामाजिक सद्भाव और राजनीतिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकते हैं। शशि थरूर का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे विदेश मामलों के जानकार माने जाते हैं और उनकी कोई भी गलत छवि देश के हितों को नुकसान पहुंचा सकती है।
कोर्ट का यह कदम दिखाता है कि न्यायपालिका इस नए खतरे को समझ रही है और जरूरी सुरक्षा प्रदान करने को तैयार है। हालांकि, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उन्हें ऐसे कंटेंट को तेजी से हटाने और दोबारा आने से रोकने के लिए और बेहतर तंत्र विकसित करने होंगे। अंत में, इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि तकनीक का दुरुपयोग रोकने के लिए मजबूत कानूनी ढांचे की जरूरत है। शशि थरूर को मिली राहत न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत लड़ाई का नतीजा है, बल्कि डिजिटल अधिकारों की व्यापक बहस को भी आगे बढ़ाएगी।



