दिल्ली हाईकोर्ट में कथित शराब घोटाले के मामले में अब सुनवाई की तारीख साफ हो गई है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत मंगलवार, 11 मई से मुख्य दलीलें सुनने वाली है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और नेता दुर्गेश पाठक द्वारा अदालत का बहिष्कार किए जाने के बावजूद कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है।
कोर्ट ने इन तीनों आरोपियों के लिए न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त करने की व्यवस्था की है ताकि उनके पक्ष की दलीलें भी सुनी जा सकें। यह घटनाक्रम दिल्ली के आम नागरिकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शराब नीति घोटाले से जुड़े फैसले सीधे सरकारी खजाने, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर असर डालते हैं।
जस्टिस शर्मा की अदालत में शुक्रवार को क्या हुआ?
शुक्रवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि आरोपी नंबर 16 की ओर से एक और वकालतनामा दाखिल किया गया है। हालांकि देरी के कारण जवाब दाखिल करने का अधिकार पहले ही बंद कर दिया गया था, लेकिन कोर्ट ने इसे रिकॉर्ड पर ले लिया।
अदालत को यह भी बताया गया कि याचिका की स्वीकार्यता के खिलाफ दो आवेदन दायर किए गए हैं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि चूंकि यह सीबीआई की याचिका है, इसलिए पहले उन्हें दलीलें रखने का मौका मिलना चाहिए। कोर्ट ने स्वीकार्यता पर पहले सुनवाई करने का इरादा जताया।
तीन आरोपियों के बहिष्कार पर कोर्ट का सख्त रुख
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने साफ कहा कि अब तीन आरोपी बचे हैं जो अदालत में पेश नहीं हो रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं कुछ न्यायमित्रों की सहमति का इंतजार कर रही हूं जो इनके पक्ष को रखेंगे।”
कोर्ट ने फैसला किया है कि सोमवार को न्यायमित्र नियुक्त किए जाएंगे और मंगलवार से मुख्य बहस शुरू होगी। जस्टिस शर्मा ने पहले भी ऐलान किया था कि पेश न होने वाले पक्षकारों के लिए वे न्यायमित्र नियुक्त करेंगी। यह व्यवस्था इसलिए की जा रही है ताकि न्याय की प्रक्रिया किसी भी वजह से रुके नहीं।
केजरीवाल ने बहिष्कार क्यों किया?
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने का फैसला किया है। केजरीवाल चाहते थे कि यह केस जस्टिस शर्मा की बेंच न सुने। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और खुद जस्टिस शर्मा द्वारा इस मांग को खारिज किए जाने के बाद तीनों नेताओं ने कहा कि न वे खुद पेश होंगे और न ही उनके वकील।
आप नेताओं ने जस्टिस शर्मा पर हितों के टकराव समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं और दावा किया है कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने का भरोसा नहीं है। इस बहिष्कार ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।
कानूनी प्रक्रिया पर क्या पड़ेगा असर?
दिल्ली हाईकोर्ट का यह रुख साफ संदेश देता है कि कोई भी पक्ष अदालत की कार्यवाही को रोक या प्रभावित नहीं कर सकता। न्यायमित्र की नियुक्ति से सुनवाई सुचारू रूप से चलेगी और सभी पक्षों के तर्कों को ध्यान में रखा जाएगा।
आम पाठक इस पूरे प्रकरण को लेकर चिंतित हैं क्योंकि ऐसे बड़े घोटाले के मामलों में समय पर फैसला न हो पाना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। अब नजरें सोमवार को होने वाली न्यायमित्र नियुक्ति और मंगलवार से शुरू होने वाली बहस पर टिकी हुई हैं। यह मामला न सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए, बल्कि दिल्ली के प्रशासन और भविष्य की नीतियों के लिए भी अहम माना जा रहा है।



