राजनीति में शुक्रवार का दिन आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका लेकर आया। पार्टी के सात राज्यसभा सांसद—राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी—अचानक BJP में शामिल हो गए। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ AAP की संसदीय ताकत को कम किया है, बल्कि पार्टी के भीतर की खींचतान को भी सामने ला दिया है। अब हालात यह हैं कि राज्यसभा में AAP के पास केवल तीन सांसद ही बचे हैं। ऐसे में पार्टी की राजनीतिक स्थिति और प्रभाव दोनों पर सवाल उठने लगे हैं।
अयोग्यता पर घमासान: आज ही दायर होगी याचिका
AAP इस पूरे मामले को लेकर आक्रामक रुख में आ गई है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह इन बागी सांसदों के खिलाफ राज्यसभा सचिवालय में याचिका दायर करेगी। पार्टी का तर्क है कि ये सांसद सीधे तौर पर पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हुए हैं, ऐसे में उनकी सदस्यता खत्म होनी चाहिए।
कानूनी सलाह भी ली जा रही है और जरूरत पड़ी तो मामला अदालत तक ले जाने की तैयारी है। हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मामला इतना सीधा नहीं है। अतीत में ऐसे मामलों में अलग-अलग फैसले देखने को मिले हैं।
क्या बचेंगे बागी सांसद? पुराना उदाहरण बना सहारा
इस पूरे विवाद में एक अहम सवाल यह है कि क्या इन सांसदों की सदस्यता वाकई रद्द होगी? जानकारों का कहना है कि यह निर्भर करेगा कि इसे “विलय” माना जाता है या “दल-बदल”।
पहले भी ऐसा मामला सामने आ चुका है, जब वेंकैया नायडू के सभापति रहते हुए TDP के सांसदों ने BJP में विलय किया था और उनकी सदस्यता बरकरार रही थी। ऐसे उदाहरण AAP के लिए कानूनी लड़ाई को और जटिल बना सकते हैं।
केजरीवाल बनाम राघव: बयानबाजी से बढ़ी सियासी गर्मी
इस सियासी उठापटक के बीच बयानबाजी भी तेज हो गई है। अरविंद केजरीवाल ने सीधे BJP पर निशाना साधते हुए कहा कि यह पंजाब के लोगों के साथ धोखा है।
वहीं, राघव चड्ढा ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि AAP अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है। उन्होंने कहा कि वह “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” थे और अब जनता के और करीब जाने का फैसला लिया है।
यह टकराव सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि पार्टी की छवि और भविष्य पर भी असर डाल सकता है।
AAP के सामने अस्तित्व की चुनौती
राज्यसभा में संख्या घटने के बाद AAP की आवाज कमजोर पड़ सकती है। यह बदलाव आने वाले विधायी मामलों और राजनीतिक रणनीति पर असर डाल सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि राज्यसभा सचिवालय इस पूरे मामले में क्या फैसला लेता है। साथ ही, अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्थिति में यह मामला लंबी कानूनी लड़ाई का रूप भी ले सकता है।
कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम सिर्फ एक पार्टी का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में दल-बदल और संसदीय नियमों की नई परीक्षा भी बन गया है।


