इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन अपराध की शिकार नाबालिग बच्चियों को आर्थिक सहायता देने के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि POCSO मामले में पीड़िता को सरकारी सहायता देने के लिए प्रवेशात्मक यौन हमले को दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती। उत्तर प्रदेश की रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना के तहत ऐसी रिपोर्ट न होने के आधार पर सहायता का दावा खारिज करना असंवैधानिक है। कोर्ट ने संबंधित शर्त को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को पीड़िता को 10 दिनों के भीतर तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का निर्देश दिया है। इस फैसले का सीधा संदेश है कि किसी बच्ची को केवल मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध न होने के कारण उसके अधिकारों और पुनर्वास के लिए मिलने वाली मदद से वंचित नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला, जिसके बाद हाईकोर्ट को देना पड़ा फैसला?
यह मामला उत्तर प्रदेश की एक नाबालिग बच्ची से जुड़ा है। बच्ची की ओर से उसकी मां ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में सरकारी योजना के तहत आर्थिक सहायता देने से इनकार किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
मामले के अनुसार, कथित घटना 28 जनवरी 2024 की है। उस समय बच्ची की उम्र महज आठ साल थी। आरोप था कि आरोपी ने बच्ची के निजी अंग में उंगली डाली और फिर अपना निजी अंग उसके मुंह में रखा। इस मामले में भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
घटना के अगले दिन बच्ची की मेडिकल जांच कराई गई। हालांकि, प्रवेशात्मक यौन हमले से संबंधित विशेष जांच के लिए सहमति नहीं मिलने के कारण निर्धारित इंजरी रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी। बाद में पुलिस ने पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी।
इसके बावजूद जिला संचालन समिति ने आर्थिक सहायता का दावा खारिज कर दिया। वजह थी कि योजना में मांगी गई विशेष इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी। बच्ची की मां ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
तीन लाख रुपये की सहायता के लिए क्यों मांगी जा रही थी इंजरी रिपोर्ट?
उत्तर प्रदेश की रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना, 2015 का उद्देश्य यौन अपराध और अन्य गंभीर अपराधों से प्रभावित महिलाओं तथा बच्चियों को आर्थिक सहायता देकर उनके उपचार और पुनर्वास में मदद करना है।
योजना के प्रावधानों के अनुसार, गंभीर प्रवेशात्मक यौन हमले के मामलों में पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत तीन लाख रुपये की सहायता का प्रावधान है। निर्धारित प्रक्रिया के तहत शुरुआती एक लाख रुपये 15 दिनों के भीतर और शेष दो लाख रुपये चार्जशीट दाखिल होने के एक महीने के भीतर दिए जाने की व्यवस्था बताई गई है।
हालांकि, संबंधित मामले में सहायता पाने के लिए एफआईआर, चार्जशीट और प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट को जरूरी दस्तावेज माना गया था।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह एक स्वतंत्र कल्याणकारी योजना है। इसलिए इसके तहत तय दस्तावेजी शर्तों का पालन जरूरी है। सरकार ने पहले के एक खंडपीठ के फैसले का हवाला देते हुए यह भी कहा कि दिखाई देने वाली शारीरिक चोट की अनिवार्यता से राहत मिलने का अर्थ इंजरी रिपोर्ट की शर्त समाप्त होना नहीं है।
लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि किसी कल्याणकारी योजना की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो जरूरतमंद पीड़िता को केवल एक दस्तावेज की कमी के कारण सहायता से बाहर कर दे।
कोर्ट ने क्यों कहा- चोट के निशान न होना अपराध को खारिज नहीं करता?
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि प्रवेशात्मक यौन हमले के हर मामले में दिखाई देने वाली शारीरिक चोट होना जरूरी नहीं है। इंजरी रिपोर्ट का उपलब्ध न होना न तो अपने आप में आरोप को गलत साबित करता है और न ही पीड़िता की आर्थिक सहायता, इलाज तथा पुनर्वास की जरूरत को कम करता है।
कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 3 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि प्रवेशात्मक यौन हमले के अपराध के लिए प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली चोट अनिवार्य शर्त नहीं है। मेडिकल साक्ष्य मामले में अहम हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अपराध की पहचान का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
इस संबंध में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले दलिप कुमार उर्फ डल्ली बनाम उत्तराखंड राज्य का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि यौन हमले के मामले में शारीरिक चोटों का होना जरूरी नहीं है।
पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164-ए(7) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) का भी उल्लेख किया। इन प्रावधानों के तहत संबंधित मेडिकल जांच के लिए महिला या उसकी ओर से सहमति देने के लिए सक्षम व्यक्ति की सहमति जरूरी है।
कोर्ट के मुताबिक, जब कानून सहमति के बिना ऐसी जांच करने की अनुमति नहीं देता, तो जांच न होने के कारण पीड़िता को सरकारी सहायता से वंचित करना उचित नहीं है। ऐसा करना पीड़िता के सामने एक अनुचित स्थिति पैदा कर सकता है, जिसमें उसे जांच के लिए सहमति देने और पुनर्वास के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद के बीच चुनाव करना पड़े।
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन, अब पीड़िता को 10 दिन में मिलेगी सहायता
हाईकोर्ट ने कहा कि इंजरी रिपोर्ट को अनिवार्य बनाने वाली शर्त संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है। इस शर्त के कारण एक ही तरह के अपराध की शिकार बच्चियों को दो अलग-अलग वर्गों में बांट दिया जाता है। एक वर्ग उन पीड़िताओं का है, जिनकी इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध है, जबकि दूसरे में वे बच्चियां आती हैं, जिनकी रिपोर्ट किसी कानूनी या व्यावहारिक वजह से तैयार नहीं हो सकी।
पीठ के अनुसार, इन दोनों वर्गों की पीड़िताओं ने समान तरह के अपराध और आघात का सामना किया हो सकता है। उन्हें उपचार, आर्थिक मदद और पुनर्वास की समान जरूरत भी हो सकती है। ऐसे में केवल रिपोर्ट की उपलब्धता के आधार पर सहायता तय करना मनमाना है।
इसी आधार पर कोर्ट ने प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट को अनिवार्य करने की शर्त असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट या इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध होने पर संबंधित अधिकारी उस पर विचार कर सकते हैं।
कोर्ट ने जिला संचालन समिति के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें बच्ची की आर्थिक सहायता का दावा खारिज किया गया था। साथ ही, राज्य सरकार को फैसले की तारीख से 10 दिनों के भीतर पीड़िता को तीन लाख रुपये की सहायता जारी करने का निर्देश दिया।
आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
इस फैसले से स्पष्ट होता है कि यौन अपराध की शिकार बच्चियों को सरकारी सहायता देने की प्रक्रिया में उनके अधिकारों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। मेडिकल रिपोर्ट अहम साक्ष्य हो सकती है, लेकिन उसकी अनुपलब्धता को अपने आप में सहायता से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। हाईकोर्ट ने साफ किया है कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य पीड़िताओं को सहारा देना है, न कि ऐसी प्रक्रियागत शर्तें लगाना जिनसे उनकी मुश्किलें और बढ़ जाएं।
