असम में कांग्रेस को बड़ा झटका: चेहरे बने गौरव गोगोई खुद हारे, BJP ने तीसरी बार बनाई सरकार

असम में कांग्रेस को बड़ा झटका: चेहरे बने गौरव गोगोई खुद हारे, BJP ने तीसरी बार बनाई सरकार

असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति की दिशा साफ कर दी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बार फिर मजबूत प्रदर्शन करते हुए तीसरी बार सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन करीब 97 सीटों पर बढ़त बनाते हुए नजर आ रहा है। वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन इस बार उम्मीद से काफी कमजोर रहा है। पार्टी महज 24 सीटों तक सिमटती दिख रही है। यह आंकड़ा पिछले चुनाव के मुकाबले भी गिरावट दर्शाता है, जिससे पार्टी के भीतर रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

सबसे बड़ा झटका: गौरव गोगोई खुद नहीं बचा पाए सीट

इस चुनाव की सबसे बड़ी खबर यह रही कि असम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी का प्रमुख चेहरा माने जा रहे गौरव गोगोई खुद चुनाव हार गए। गोगोई ने जोरहाट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें बीजेपी उम्मीदवार हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया। गोस्वामी को जहां 69 हजार से अधिक वोट मिले, वहीं गोगोई करीब 46 हजार वोटों तक सीमित रह गए। यह हार इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि कांग्रेस ने पूरे चुनाव अभियान में गोगोई को केंद्र में रखकर रणनीति बनाई थी।

जोरहाट का गणित बदला, लोकसभा और विधानसभा में अंतर

दिलचस्प बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में गौरव गोगोई ने इसी क्षेत्र से जीत दर्ज की थी। जोरहाट लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली 10 विधानसभा सीटों में उस समय कांग्रेस को बढ़त मिली थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 10 में से 9 सीटों पर बीजेपी गठबंधन की बढ़त दिखाई दी, जबकि सिर्फ सिबसागर सीट पर अन्य उम्मीदवार आगे रहे। यह बदलाव बताता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का रुख अलग-अलग हो सकता है।

हितेंद्र नाथ गोस्वामी: लगातार तीसरी जीत, मजबूत पकड़

गौरव गोगोई को हराने वाले बीजेपी उम्मीदवार हितेंद्र नाथ गोस्वामी की जीत भी खास मायने रखती है। यह उनकी लगातार तीसरी जीत है और इसके साथ ही वह अब छह बार विधायक बन चुके हैं। गोस्वामी 2017 से 2021 तक असम विधानसभा के स्पीकर भी रह चुके हैं। बीजेपी में शामिल होने से पहले वह असम गण परिषद के नेता थे और 1991 से 2001 तक तीन बार विधायक रह चुके हैं। उनकी राजनीतिक पकड़ और संगठनात्मक मजबूती ने इस चुनाव में भी उन्हें बढ़त दिलाई।

कांग्रेस के लिए संकेत: रणनीति पर फिर से विचार की जरूरत

कांग्रेस के लिए यह चुनाव कई स्तर पर चेतावनी लेकर आया है। जहां एक ओर पार्टी का कुल प्रदर्शन गिरा है, वहीं कई वरिष्ठ नेता भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। साथ ही, पार्टी ने इस बार AIUDF के साथ गठबंधन नहीं किया, जिसका असर भी नतीजों में दिखा। जिन 24 सीटों पर कांग्रेस आगे है, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम उम्मीदवारों की है, जो पार्टी के सामाजिक आधार को भी दर्शाता है। आम मतदाता के नजरिए से देखें तो यह चुनाव बताता है कि राज्य में नेतृत्व, गठबंधन और जमीनी संगठन—तीनों ही फैक्टर चुनावी नतीजों को तय करते हैं।