पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिख रहे हैं। कांग्रेस, जो कुछ दिन पहले तक तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर आक्रामक रुख अपनाने की तैयारी में थी, अब अपने तेवर नरम करती नजर आ रही है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे राष्ट्रीय मुद्दों के बीच बने नए राजनीतिक हालात का नतीजा माना जा रहा है।
आम मतदाता के नजरिए से देखें तो यह बदलाव सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति और विपक्षी एकता की दिशा तय करने वाला संकेत भी है।
पहले आक्रामकता, फिर नरमी—क्या बदला?
शुरुआत में कांग्रेस ने साफ कर दिया था कि वह बंगाल में अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी। राहुल गांधी की रैलियों में बीजेपी के साथ-साथ ममता बनर्जी पर भी सीधे हमले किए गए। मुस्लिम बहुल इलाकों से लेकर आदिवासी क्षेत्रों तक कांग्रेस ने अपनी अलग रणनीति बनाई।
लेकिन महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर संसद में हुए घटनाक्रम ने तस्वीर बदल दी। जब TMC ने अपेक्षा से ज्यादा सांसद भेजकर संविधान संशोधन के खिलाफ वोट किया, तो कांग्रेस नेतृत्व ने इसे सकारात्मक संकेत माना।
फोन कॉल से बदली राजनीति की दिशा
बिल गिरने के बाद कांग्रेस नेतृत्व की प्रतिक्रिया भी बदली हुई दिखी। सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी को फोन कर धन्यवाद दिया, जबकि राहुल गांधी ने अभिषेक बनर्जी से संपर्क साधा। यहीं से दोनों दलों के रिश्तों में आई ठंडक कुछ कम होती नजर आई।
इसके बाद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के कार्यक्रमों में भी बदलाव दिखा। राहुल गांधी ने बंगाल में आगे प्रचार नहीं किया, प्रियंका गांधी का कार्यक्रम रद्द हो गया और मल्लिकार्जुन खरगे भी सीमित उपस्थिति के साथ नजर आए।
नेतृत्व की दूरी, रणनीति में बदलाव
दिलचस्प यह है कि चुनाव प्रचार के अहम चरण में कांग्रेस के बड़े नेता बंगाल से दूरी बनाए हुए हैं। राहुल गांधी के करीबी सूत्र अब यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पार्टी की प्राथमिक लड़ाई बीजेपी से है और वह ‘सेकुलर ताकतों’ को कमजोर नहीं करना चाहती।
हालांकि, कांग्रेस मैदान से बाहर नहीं हुई है। वह अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार जारी रखेगी, लेकिन भाषा और टोन में संतुलन बनाए रखने की कोशिश दिख रही है।
अंदरूनी असहजता भी सामने आई
कांग्रेस के इस बदले रुख से पार्टी के कुछ नेता असहज भी हैं। खासतौर पर अधीर रंजन चौधरी, जो लंबे समय से ममता बनर्जी के मुखर विरोधी रहे हैं, इस बदलाव से असहज नजर आ रहे हैं।
उन्होंने पहले बीजेपी और TMC की ‘मिलीभगत’ को मुद्दा बनाया था, लेकिन बदले राजनीतिक माहौल में उनकी स्थिति थोड़ी कमजोर होती दिख रही है।
बंगाल की राजनीति में यह बदलाव संकेत देता है कि चुनाव सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर गठबंधनों और रणनीतियों का खेल भी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस और TMC के बीच यह नरमी कितनी टिकाऊ साबित होती है और इसका चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ता है।


