मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक विवाद अब सड़क से लेकर संसद और पुलिस थाने तक पहुंच गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से उनके इस्तीफे की मांग के एक दिन बाद कांग्रेस ने 25 सितंबर को देशभर में चुनाव आयोग के कार्यालयों तक मार्च निकालने का ऐलान किया है। दूसरी ओर, सीजेपी ने भी CEC को 48 घंटे में इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दिया है। इसी बीच तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने दिल्ली पुलिस में शिकायत देकर मामले में FIR दर्ज करने और जांच की मांग की है।
विवाद की शुरुआत चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी एक रिपोर्ट के बाद हुई। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग में अलग-अलग राय और लिखित टिप्पणियां आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए जाते हैं।
48 घंटे का अल्टीमेटम, आज क्या होगा?
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। संगठन ने कहा है कि अगर तय समय में इस्तीफा नहीं दिया गया तो देशभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी भी दी गई है।
यह अलग घटनाक्रम कांग्रेस के आंदोलन के समानांतर चल रहा है। कांग्रेस ने 25 सितंबर को सभी प्रदेश कांग्रेस समितियों को अपने-अपने राज्यों में चुनाव आयोग के दफ्तरों तक मार्च निकालने के निर्देश दिए हैं।
कांग्रेस की मांगों में CEC को पद से हटाना, उनके खिलाफ कार्रवाई करना और उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों तथा मतदाता सूची में हुए बदलावों की स्वतंत्र समीक्षा शामिल है।
इसके बाद 28 सितंबर को जिला कांग्रेस समितियों को जिला मुख्यालयों तक मार्च निकालने के लिए कहा गया है।
राहुल गांधी ने क्यों उठाया CEC के इस्तीफे का मुद्दा?
गुरुवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए।
राहुल गांधी ने अपने आरोपों के समर्थन में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से संबंधित एक रिपोर्ट का हवाला दिया। उनका कहना था कि चुनाव व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं और CEC को पद छोड़ना चाहिए।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों के बीच अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग के मुताबिक, लिखित टिप्पणियां या अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति में लिए जाते हैं।
यही अंतर इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक तरफ विपक्ष आयोग के भीतर मतभेदों का हवाला दे रहा है, जबकि आयोग इसे अपनी सामान्य आंतरिक कार्यप्रणाली का हिस्सा बता रहा है।
महुआ मोइत्रा की पुलिस शिकायत से मामला और गरम
विवाद के बीच TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को दिल्ली के संसद मार्ग थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR दर्ज करने और मामले की जांच की मांग की है।
मोइत्रा ने चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़े आरोपों का हवाला दिया। उनका कहना है कि अगर दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद फैसले लिए गए हैं, तो इसकी जांच होनी चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पुलिस ने अभी FIR दर्ज नहीं की है। इसलिए शिकायत और FIR के बीच का अंतर भी यहां महत्वपूर्ण है। शिकायत दिया जाना अपने आप में किसी आरोप के साबित होने का निष्कर्ष नहीं है।
विवाद की जड़ में क्या है चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया?
पूरा विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और आदेशों को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट में इन कथित आपत्तियों को विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, मतदाता सूची, मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने और मतदाता पंजीकरण की प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों से जोड़ा गया।
हालांकि इन दावों के बीच चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष अलग है। आयोग का कहना है कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर विचार-विमर्श या अलग-अलग टिप्पणियां होना असामान्य नहीं है। अंतिम फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
अब कांग्रेस के देशव्यापी मार्च और CEC के खिलाफ अलग-अलग स्तरों पर उठ रही मांगों से यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन गया है।
आम मतदाता के लिए इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ा है। फिलहाल राजनीतिक दलों के आरोप और चुनाव आयोग का जवाब—दोनों सार्वजनिक हैं। आगे की कार्रवाई और उपलब्ध दस्तावेज इस विवाद के अगले चरण को तय करेंगे।


