बिहार में कांग्रेस की ऐतिहासिक CWC बैठक, 35 साल बाद खोई जमीन तलाशने की कोशिश

बिहार में कांग्रेस की ऐतिहासिक CWC बैठक, 35 साल बाद खोई जमीन तलाशने की कोशिश

बिहार में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की एतिहासिक बैठक होने जा रही है. आजादी के बाद राज्य में कांग्रेस का पहली बार इस तरह का मंथन है. इससे पहले 1912 में पटना और 1922 में गया में पार्टी का अधिवेशन हुआ था. इस बैठक में बिहार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी. कांग्रेस बिहार में खोई जमीन तलाश रही है और राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में उमड़ी भीड़ को देखते हुए उसे लग रहा है वो कुछ कमाल कर सकती है.

बिहार एक समय कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था. लंबे समय तक उसने यहां की सत्ता पर राज किया. सूबे को एक से बढ़कर एक मु्ख्यमंत्री दिए, जगन्नाथ मिश्रा, केधार पांडे से लेकर अब्दुल गफूर तक. 1990 तक कांग्रेस को हराना किसी सपने से कम नहीं होता था. यही वो साल तब कांग्रेस ने राज्य में अपना आखिरी सीएम जगन्नाथ मिश्रा के रूप में देखा था. यानी कांग्रेस को हिंदी पट्टी वाले अहम राज्य में राज किए हुए 35 साल हो गए.

कौन था बिहार का पहला सीएम?

आजादी के बाद बिहार को पहला मुख्यमंत्री कांग्रेस ने ही दिया था. श्रीकृष्णा सिन्हा राज्य में सीएम बने थे. 31 जनवरी, 1961 तक वह इस पद पर रहे. इसके बाद 1 फरवरी से 18 फरवरी 1961 तक दीप नरायाण सिंह राज्य के सीएम रहे. फिर 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक बिनोदानंद झा मुख्यमंत्री रहे.

2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1965 तक बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर केबी सहाय बैठे. इसके बाद 5 मार्च 1965 का कांग्रेस का पत्ता साफ हुआ और जनता क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा को राज्य की कमान मिली. वह तीन साल तक इस पद पर रहे. 21 मार्च 1968 तक कांग्रेस सत्ता से दूर रही. 22 मार्च, 1968 को उसकी वापसी हुई और भोला पासवान शास्त्री की राज्य का सीएम बनाया गया. इसके बाद 22 दिसंबर 1970 तक वह बिहार की सत्ता संभालती रही.

कर्पूरी ठाकुर के रूप में नया सीएम

23 दिसंबर, 1970 वो तारीख थी जब राज्य को कर्पूरी ठाकुर के रूप में नया सीएम मिला. सोशलिस्ट पार्टी से वो सत्ता में आए. 2 जून, 1971 में कांग्रेस फिर सत्ता में आई और भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने.इसके बाद 30 अप्रैल 1975 तक सीएम जगन्नाथ मिश्रा के रूप में कांग्रेस के पास सत्ता रही. 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई. 3 साल तक सरकार से दूर रहने के बाद 8 जून, 1980 को कांग्रेस की वापसी हुई और जगन्नाथ मिश्रा फिर सीएम बने. इसके बाद 10 मार्च, 1990 तक कांग्रेस सत्ता में रही. सीएम अलग-अलग रहे. इस दौरान चंद्रशेखर सिंह, भगवत झा आजाद जैसे नेता सीएम के रूप में सत्ता का स्वाद चखे.

बिहार में कांग्रेस के प्रदर्शन को तीन अलग-अलग फेज में बांटकर देख सकते हैं. पहला 1947 से 1975 तक, दूसरा 1977 से 1990 तक और तीसरा 1990 से अब तक… आजादी के बाद शुरुआत तीन दशक राज्य में कांग्रेस हावी थी. उसके सामने कोई टिकता नहीं था. लेकिन 1975 में इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की कहानी एकदम बदल गई. जिस पार्टी एकछत्र राज हुआ करता था उसे अब जनता पार्टी से टक्कर मिलने लगे. धीरे-धीरे उसका जनाधार कम होता गया.

1972 के विधानसभा चुनाव में 167 सीट जीतने वाली कांग्रेस 1977 के चुनाव में महज 57 सीट जीत सकी. जनता पार्टी के खाते में 214 सीटें आईं. 1980 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी हुई. 1990 तक वो सत्ता में तो रही, लेकिन दबदबा नहीं बना पाई. 1990 के बाद बिहार में जेडीयू और आरजेडी का उदय हुआ. ये दोनों पार्टियां कांग्रेस का विकल्प बन गईं. इसी दौरान बीजेपी भी बढ़ने लगी. एक दौर में जब सिर्फ कांग्रेस का राज हुआ करता था वहां अब उसे तीन-तीन पार्टियों से टक्कर मिलने लगी.

विधानसभा चुनावों में ऐसा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन

  • 1952 चुनाव- कांग्रेस 232 सीटें जीती
  • 1957 चुनाव-210 सीटों पर जीत
  • 1962 चुनाव- 185 सीटों पर जीत
  • 1967 चुनाव- 128 सीटों पर जीत
  • 1969 चुनाव- 118 सीटों पर जीत
  • 1972 चुनाव- 167 सीटों पर जीत
  • 1977 चुनाव- 57 सीटों पर जीत
  • 1980 चुनाव- 169 सीटों पर जीत
  • 1985 चुनाव- 196 सीटों पर जीत
  • 1990 चुनाव-71 सीटों पर जीत
  • 1995 चुनाव-29 सीटों पर जीत
  • 2000 चुनाव- 23 सीटों पर जीत
  • 2005 चुनाव- 10 सीटों पर जीत
  • 2005 चुनाव- 9 सीटों पर जीत
  • 2010 चुनाव- 4 सीटों पर जीत
  • 2015 चुनाव- 27 सीटों पर जीत
  • 2020 चुनाव- 19 सीटों पर जीत