देश की राजनीति में कांग्रेस का समय अच्छा नहीं चल रहा है। 2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद 2021 में केरल और असम की सरकारें भी हाथ से निकल गईं। असम में बीजेपी काबिज हुई तो केरल में लेफ्ट ने अपना दबदबा कायम रखा। 2024 लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली चुनाव में हार ने उसकी कमर तोड़ दी।
अब कांग्रेस 2026 के असम और केरल विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है। दिल्ली चुनाव खत्म होते ही कांग्रेस ने कमर कस ली। गुरुवार को असम और शुक्रवार को केरल के नेताओं के साथ बैठक हुई, जिसमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी भी शामिल हुए। इन बैठकों में कांग्रेस की चुनावी रणनीति को धार देने पर चर्चा हुई, क्योंकि सत्ता में वापसी अब कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं।
असम में कांग्रेस की रणनीति क्या होगी?
असम में कांग्रेस पिछले 9 साल से सत्ता से बाहर है। बीजेपी के मजबूत किले को तोड़ने के लिए कांग्रेस ने कुछ अहम मुद्दों को हथियार बनाने का फैसला किया है। पार्टी असम की कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और चाय बागानों के मजदूरों की समस्याओं को लेकर जनता के बीच जाएगी।
कांग्रेस की रणनीति में ये मुख्य बिंदु शामिल हैं:
- चाय बागान मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा: कांग्रेस का दावा है कि बीजेपी सरकार ने चाय बागान मजदूरों की समस्याओं को नजरअंदाज किया है।
- हिमंत सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप: कांग्रेस इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी कर रही है।
- निकाय चुनाव पर फोकस: पार्टी निकाय चुनावों के जरिए अपनी स्थिति का आकलन करेगी और फिर विधानसभा चुनाव की रणनीति को धार देगी।
- नेतृत्व परिवर्तन: भूपेन बोरा की जगह गौरव गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है।
कांग्रेस इस बार असम के चाय बागानों और आदिवासी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दे रही है। पार्टी को लगता है कि इन समुदायों से उसे 40% वोट मिल सकते हैं। कांग्रेस छोटे दलों के साथ गठबंधन की योजना भी बना रही है ताकि वोटों का बंटवारा ना हो।
केरल में सत्ता में वापसी की राह आसान नहीं!
केरल में कांग्रेस 9 साल से सत्ता से बाहर है। यहां पिनराई विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट मजबूत स्थिति में है। 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने केरल में क्लीन स्वीप किया था, जिससे पार्टी के हौसले बुलंद हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव की चुनौती अलग है।
केरल में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी है। पार्टी फिलहाल तीन गुटों में बंटी है:
- केसी वेणुगोपाल गुट: राहुल गांधी के सबसे करीबी माने जाते हैं।
- रमेश चेन्निथला गुट: पार्टी में कमजोर हो गया है, लेकिन अब भी प्रभावी है।
- शशि थरूर गुट: थरूर ने राहुल गांधी से मिलकर खुद को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करने की मांग रखी थी, जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बाद से उन्होंने बागी तेवर अपना लिए हैं।
कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वो केरल में किस चेहरे के साथ चुनाव लड़ेगी। केसी वेणुगोपाल खुद को सीएम उम्मीदवार के रूप में देख रहे हैं, लेकिन थरूर की सक्रियता से मामला पेचीदा हो गया है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह गुटबाजी दूर करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौतियां
- गुटबाजी: असम और केरल दोनों में कांग्रेस गुटबाजी से जूझ रही है।
- मजबूत विपक्ष: असम में बीजेपी और केरल में लेफ्ट मजबूत स्थिति में हैं।
- मजबूत नेतृत्व का अभाव: कांग्रेस को तय करना होगा कि इन राज्यों में उसका नेतृत्व कौन करेगा।
- स्थानीय मुद्दों पर पकड़: सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों से चुनाव नहीं जीता जा सकता, कांग्रेस को स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ बनानी होगी।
2026 के असम और केरल विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति जैसे होंगे। देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अपनी रणनीति से इन दोनों राज्यों में सत्ता में वापसी कर पाती है या नहीं!