5 साल से जेल में बंद कथित ISIS मॉड्यूल आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत, UAPA केस में बड़ा फैसला

5 साल से जेल में बंद कथित ISIS मॉड्यूल आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत, UAPA केस में बड़ा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित ISIS मॉड्यूल से जुड़े UAPA मामले में करीब पांच साल से जेल में बंद मोहम्मद शहजाद कमाल को जमानत दे दी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कमाल पर ISIS से जुड़े बताए गए संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम की गतिविधियों के लिए धन जुटाने और उसे पहुंचाने की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया था। कमाल 31 अगस्त 2021 से हिरासत में था। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब वह जमानत पर बाहर आ सकेगा। हालांकि, अदालत का विस्तृत आदेश अभी जारी होना बाकी है, इसलिए जमानत की शर्तों और फैसले के विस्तृत कानूनी आधार की तस्वीर बाद में साफ होगी।

पांच साल की हिरासत के बाद मिली राहत

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने मोहम्मद शहजाद कमाल की अपील पर सुनवाई की। कमाल ने विशेष अदालत के 29 मई 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

हाईकोर्ट ने अब उसकी अपील स्वीकार करते हुए जमानत देने का आदेश दिया है। मामले में कमाल के खिलाफ UAPA के तहत 30 अगस्त 2022 को आरोप तय किए गए थे।

यहां यह समझना जरूरी है कि जमानत मिलने का मतलब मामले में आरोपी को बरी किया जाना नहीं है। उसके खिलाफ लगे आरोपों पर मुकदमे में आगे सुनवाई होगी और अंतिम फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

NIA का आरोप क्या है?

जांच एजेंसी के मुताबिक, कमाल पर फरवरी 2017 से जनवरी 2019 के बीच कई मौकों पर सह-आरोपी मोहम्मद अबसर को पैसे उपलब्ध कराने का आरोप है। NIA का कहना था कि इन पैसों का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाना था।

जांच के दौरान कमाल के सह-आरोपी मोहम्मद साकिब के साथ संपर्क का भी दावा किया गया। एजेंसी के मुताबिक, दोनों के बीच फेसबुक और व्हाट्सऐप पर बातचीत हुई थी।

NIA ने दावा किया कि बरामद बातचीत में पैसे के लेनदेन और कथित जिहादी गतिविधियों के लिए वित्तीय मदद से संबंधित चर्चा थी। जांच एजेंसी ने कमाल पर जम्मू-कश्मीर में सक्रिय तहरीक-ए-आजादी जम्मू-कश्मीर का समर्थन करने का आरोप भी लगाया।

एजेंसी की कहानी के मुताबिक, कमाल कथित तौर पर जिहादी विचारधारा से प्रभावित था और हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम से भी जुड़ा हुआ था। NIA ने इस संगठन को ISIS से संबद्ध आतंकी संगठन बताया है।

बचाव पक्ष ने सबूतों को लेकर क्या कहा?

कमाल की ओर से अदालत में इन आरोपों का विरोध किया गया। उसकी तरफ से दलील दी गई कि आरोपपत्र और उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों में ऐसी पर्याप्त सामग्री नहीं है, जिसे मुकदमे के दौरान कानूनी साक्ष्य के रूप में साबित किया जा सके।

बचाव पक्ष का कहना था कि अभियोजन के पास ऐसी ठोस सामग्री नहीं है, जिसके आधार पर आरोपों को सुनवाई के दौरान प्रमाणित किया जा सके। यह भी तर्क दिया गया कि अगर आरोपपत्र में मौजूद सामग्री मुकदमे के दौरान कानूनी साक्ष्य में तब्दील नहीं हो पाती है, तो आखिर में आरोपी के बरी होने की स्थिति बन सकती है।

इसी के साथ लंबे समय से चली आ रही हिरासत को भी जमानत के पक्ष में एक महत्वपूर्ण आधार के तौर पर रखा गया।

जमानत मिली, लेकिन केस अभी खत्म नहीं हुआ

हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद कमाल की अपील मंजूर कर ली और उसे जमानत देने का आदेश दिया। हालांकि, अदालत ने किन विशेष कानूनी आधारों को ध्यान में रखते हुए यह राहत दी और जमानत की शर्तें क्या होंगी, इसका पूरा विवरण विस्तृत आदेश आने के बाद ही सामने आएगा।

इस मामले में आम पाठक के लिए सबसे अहम बात यही है कि जमानत और बरी होना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं। हाईकोर्ट का मौजूदा फैसला कमाल को मुकदमे की सुनवाई के दौरान जेल से बाहर रहने की अनुमति देता है। इससे उसके खिलाफ लगाए गए आरोप खत्म नहीं होते।

अब आगे की कार्यवाही मुकदमे में पेश होने वाले साक्ष्यों और अदालत के मूल्यांकन पर निर्भर करेगी। विस्तृत आदेश सामने आने के बाद यह भी स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट ने लंबे समय की हिरासत और आरोपपत्र में उपलब्ध सामग्री को किस तरह तौला।