दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त रुख! केजरीवाल, सिसोदिया समेत AAP नेताओं पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट का नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त रुख! केजरीवाल, सिसोदिया समेत AAP नेताओं पर क्रिमिनल कंटेम्प्ट का नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ टिप्पणियों को लेकर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य के खिलाफ क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू कर दी है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने नोटिस जारी करते हुए सभी आरोपियों से जवाब मांगा है।

यह घटनाक्रम आबकारी नीति मामले से जुड़ा है, जिसमें जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा CBI की अपील पर सुनवाई कर रही थीं। AAP नेताओं ने जज को केस से हटाने की मांग की थी, जिसे जस्टिस शर्मा ने 20 अप्रैल को खारिज कर दिया था। आम नागरिकों के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा बनाए रखने से जुड़ा है। अगर न्यायाधीशों पर दबाव बनाया जा सकता है तो आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद कैसे बनी रहेगी?

सोशल मीडिया पोस्ट्स और बायकॉट पर आधारित कार्रवाई

कोर्ट ने 14 मई के आदेश के आधार पर यह कार्रवाई शुरू की है। सिंगल जज ने सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, लेटर और अन्य सार्वजनिक सामग्री पर भरोसा किया है। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि सभी सबूत सुरक्षित रखे जाएं।

केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने जस्टिस शर्मा को हटाने की मांग की थी। जज ने अपने आदेश में साफ कहा था कि किसी नेता को ज्यूडिशियरी पर अविश्वास के बीज बोने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उनके अनुसार, जज को हटाने की अर्जी न्याय व्यवस्था को कमजोर करने के बराबर है। जस्टिस शर्मा के आदेश से पहले और बाद में उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान चला था, जिसके चलते उन्होंने अवमानना की कार्रवाई शुरू की।

सुनवाई में कोई वकील नहीं पहुंचा, कोर्ट ने अमicus क्यूरी नियुक्त करने का फैसला

सुनवाई के दौरान AAP नेताओं की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ। इसके बावजूद बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक अमicus क्यूरी नियुक्त करने का फैसला लिया है। आरोपी पक्ष को 4 हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करने का समय दिया गया है।

अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को होगी। कोर्ट ने आबकारी नीति मामले को किसी अन्य बेंच को ट्रांसफर कर दिया है, ताकि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके। CBI की अपील अब जस्टिस मनोज जैन सुनेंगे।

न्यायपालिका की गरिमा बचाने की कोशिश

यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सीमित नहीं है। यह बड़े सवाल उठाता है कि राजनीतिक नेता न्यायाधीशों पर दबाव बनाने या उन्हें विवादित बनाने की कोशिश क्यों करते हैं। जस्टिस शर्मा ने अपने विस्तृत आदेश में इन नेताओं द्वारा लिखे गए पत्रों, वीडियो और बायकॉट की घोषणाओं का जिक्र किया है।

आम पाठक के नजरिए से देखें तो स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र का आधार है। अगर जजों को केस से हटाने की मांगें बिना ठोस आधार के की जाने लगें तो पूरी न्याय प्रक्रिया प्रभावित होगी। दिल्ली हाईकोर्ट का यह कदम संदेश देता है कि न्यायाधीशों की गरिमा पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

AAP नेताओं पर लगे आरोपों का जवाब अब कोर्ट में आना बाकी है। इस मामले का नतीजा न सिर्फ आबकारी नीति मामले की सुनवाई पर असर डालेगा बल्कि भविष्य में न्यायाधीशों के खिलाफ अभियान चलाने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगाने में मदद करेगा।

देश के नागरिक उम्मीद करते हैं कि यह विवाद जल्द सुलझे और न्याय व्यवस्था मजबूत होकर उभरे।