दिल्ली की राजनीति और अदालती गलियारों में मंगलवार को एक नया और बेहद दिलचस्प कानूनी मोड़ देखने को मिला। दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy) मामले में चल रही सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लेते हुए तीन ‘एमिकस क्यूरी’ (Amicus Curiae) यानी ‘अदालत के मित्र’ नियुक्त कर दिए हैं। यह कदम तब उठाया गया जब इस मामले के मुख्य उत्तरदाता—अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक—ने अदालती कार्यवाही में हिस्सा लेने से साफ इनकार कर दिया।
एक आम नागरिक के नजरिए से देखें तो यह स्थिति काफी असाधारण है। जब किसी मामले के मुख्य पक्ष ही अदालत में अपनी बात रखने से मना कर दें, तो कानूनी प्रक्रिया एक शून्य की स्थिति में पहुंच जाती है। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए अदालत ने विशेषज्ञों की मदद लेने का फैसला किया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने एक पक्ष के जवाब दाखिल करने के अधिकार को भी समाप्त कर दिया है और मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार के लिए तय कर दी है।
केजरीवाल का ‘सत्याग्रह’ और न्याय की उम्मीद पर सवाल
इस पूरी कानूनी जद्दोजहद की शुरुआत तब हुई जब आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने एक सार्वजनिक बयान जारी कर जस्टिस स्वर्णकांत शर्मा की अदालत में पेश होने से मना कर दिया। केजरीवाल ने अपने इस फैसले के पीछे एक गहरा दार्शनिक और नैतिक तर्क दिया है। उन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए इसे अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ और ‘सत्याग्रह’ करार दिया।
केजरीवाल का कहना है कि वर्तमान न्यायिक परिस्थितियों को देखते हुए उनकी “न्याय मिलने की उम्मीद” डगमगा गई है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वह न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही किसी वकील के माध्यम से इस कार्यवाही का हिस्सा बनेंगे। एक मुख्यमंत्री स्तर के व्यक्ति द्वारा अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर कार्यवाही से दूर रहने का यह फैसला कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
अदालत की दो टूक: ‘अंदाजे न्याय का आधार नहीं हो सकते’
इससे पहले, अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा से खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग (Recuse) करने की गुहार लगाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि केजरीवाल द्वारा लगाए गए भेदभाव के आरोप केवल ‘अंदाजों’ और ‘कल्पनाओं’ पर आधारित थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस सबूत के न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठाना न केवल गलत है, बल्कि यह संस्थागत साख को भी कमजोर करता है।
जस्टिस शर्मा की पीठ ने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों के परिवार के सदस्यों के प्रोफेशनल काम या उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने को भेदभाव का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि सिर्फ खराब नतीजे की संभावना के डर से जजों को केस से हटाने की मांग की जाने लगी, तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी।
आगे की राह: सुप्रीम कोर्ट की तैयारी और एमिकस क्यूरी की भूमिका
केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा को एक पत्र लिखकर अपनी चिंताएं भी साझा की थीं। उन्होंने कहा कि अदालत के तर्कों और लहजे से उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी याचिका को व्यक्तिगत आलोचना के तौर पर लिया गया है। हालांकि उन्होंने न्यायपालिका के प्रति सम्मान जताया, लेकिन यह भी संकेत दिया कि वे हाई कोर्ट के इस आदेश को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती दे सकते हैं।
फिलहाल, सीबीआई (CBI) द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर की गई इस अपील में अब ‘एमिकस क्यूरी’ की भूमिका अहम होगी। चूंकि मुख्य आरोपी प्रक्रिया से बाहर हैं, इसलिए ये नियुक्त विशेषज्ञ अब कानून के बिंदुओं पर अदालत की मदद करेंगे। शुक्रवार को होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि बिना मुख्य पक्षों की मौजूदगी के यह हाई-प्रोफाइल केस किस दिशा में आगे बढ़ता है।


