पैरोल का आदेश फिर भी नहीं हुई रिहाई, तिहाड़ जेल अधीक्षक पर हाईकोर्ट ने शुरू की अवमानना कार्रवाई

पैरोल का आदेश फिर भी नहीं हुई रिहाई, तिहाड़ जेल अधीक्षक पर हाईकोर्ट ने शुरू की अवमानना कार्रवाई

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद एक विचाराधीन कैदी की पैरोल पर रिहाई नहीं हुई तो मामला सीधे जेल प्रशासन की जवाबदेही तक पहुंच गया। अनवर हुसैन को चार सप्ताह की पैरोल देने के अदालत के निर्देश के बाद भी वह जेल में ही रहा। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए तिहाड़ जेल के अधीक्षक के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि जेल अधिकारी का आचरण उसके आदेश का जानबूझकर पालन न करने जैसा प्रतीत होता है।

मामले की सुनवाई जस्टिस पुरुषइंद्र कुमार कौरव कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि हुसैन पहले ही करीब 5 साल 5 महीने बतौर विचाराधीन कैदी हिरासत में रह चुका है, ऐसे में संवैधानिक अदालत के रिहाई के आदेश के बावजूद उसका जेल में बने रहना गंभीर सवाल खड़े करता है।

सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए मांगी थी पैरोल, हाईकोर्ट ने दी थी चार हफ्ते की राहत

अनवर हुसैन ने सबसे पहले जेल प्रशासन की ओर से पैरोल आवेदन खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। उनकी आपराधिक अपील सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी थी और वह आगे उपलब्ध कानूनी उपायों के लिए समय चाहते थे। इसी आधार पर उन्होंने आठ सप्ताह की पैरोल की मांग की थी।

मामले पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 30 जुलाई 2026 को चार सप्ताह की पैरोल देने का आदेश दिया। इसमें कहा गया कि रिहाई सक्षम प्राधिकारी की ओर से तय की जाने वाली शर्तों के अधीन होगी।

लेकिन इसके बाद एक अड़चन सामने आई। जेल प्रशासन ने वे शर्तें तय ही नहीं कीं जिनके आधार पर हुसैन को रिहा किया जाना था। नतीजा यह हुआ कि अदालत के आदेश के बावजूद कैदी जेल में ही रहा।

हुसैन ने इसके बाद हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने बताया कि प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण अदालत के आदेश का वास्तविक लाभ खत्म नहीं किया जा सकता।

11 अगस्त को कोर्ट ने खुद तय कर दीं शर्तें, फिर भी नहीं खुला जेल का दरवाजा

इस स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को अपने पहले के आदेश में बदलाव किया। इस बार अदालत ने हुसैन की पैरोल पर रिहाई के लिए आवश्यक शर्तें खुद निर्धारित कर दीं।

इसके बाद हुसैन के परिवार ने जेल अधिकारियों से संपर्क किया ताकि अदालत द्वारा तय शर्तों को पूरा किया जा सके। लेकिन परिवार को बताया गया कि जेल प्रशासन 11 अगस्त के आदेश पर तब तक कार्रवाई नहीं करेगा, जब तक आदेश सीधे हाईकोर्ट से प्राप्त न हो जाए।

यहीं से अदालत का रुख और सख्त हो गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि 11 अगस्त का आदेश कोई अनौपचारिक दस्तावेज नहीं था। वह डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित सार्वजनिक दस्तावेज था और उसकी प्रामाणिकता आसानी से जांची जा सकती थी। इसलिए केवल आदेश सीधे अदालत से नहीं मिलने का आधार बनाकर रिहाई रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

कोर्ट को प्रथम दृष्टया लगा कि इस आधार का इस्तेमाल अदालत के आदेश को लागू होने से रोकने के लिए किया गया।

जेल अधीक्षक ने दी सफाई, कोर्ट ने पूछा- पहले अनुभव का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?

अदालत ने जेल अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और यह बताने का निर्देश दिया कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।

सुनवाई के दौरान अधीक्षक ने कहा कि उनका फैसला किसी दुर्भावना से प्रेरित नहीं था। उनका कहना था कि हुसैन के पैरोल वाले पते का सत्यापन नहीं हो पाया था। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी प्रक्रिया जेल प्रशासन में सामान्य और नियमित है।

लेकिन कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ।

जस्टिस कौरव ने सवाल उठाया कि अगर पता सत्यापन जैसी स्थिति जेल प्रशासन के लिए सामान्य है, तो अधिकारी ने अपने अनुभव का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, खासकर तब जब अदालत ने 30 जुलाई को ही सक्षम प्राधिकारी द्वारा लगाई जाने वाली शर्तों के अधीन रिहाई का निर्देश दे दिया था।

अदालत ने यह भी पाया कि 11 अगस्त के आदेश में हुसैन के निवास स्थान से जुड़ी कोई अतिरिक्त शर्त नहीं थी। इसके बावजूद जेल प्रशासन की ओर से ऐसी शर्त को आधार बनाकर रिहाई रोकना अदालत के निर्देश से आगे जाकर नई शर्त लगाने जैसा था।

कोर्ट ने कहा- आदेश की अनदेखी से कानून के शासन पर सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि जेल प्रशासन की कार्रवाई का सीधा परिणाम यह हुआ कि हुसैन, जो पहले ही 5 साल 5 महीने से विचाराधीन हिरासत में है, अदालत द्वारा रिहाई का निर्देश दिए जाने के बाद भी जेल में बना रहा।

अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए कहा कि जेल प्रशासन और संबंधित अधिकारी की ओर से दिए गए कमजोर और अस्थिर कारणों ने न्यायिक आदेश के प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत कानून के समान संरक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में भी गंभीर माना।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला कि जेल अधीक्षक ने 11 अगस्त के आदेश में तय व्यवस्था के विपरीत अतिरिक्त शर्तें लगाईं और इस तरह आदेश का जानबूझकर पालन नहीं किया।

इसके बाद उनके खिलाफ Contempt of Courts Act, 1971 के तहत अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी गई। जेल अधीक्षक ने अवमानना नोटिस स्वीकार कर लिया है और उन्हें अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि अदालत की अवमानना के लिए उन्हें दंडित क्यों न किया जाए।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी। उस दिन जेल अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।

Case: ANWAR HUSSAIN v. STATE NCT OF DELHI