जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से क्यों खफा हैं केजरीवाल? हाईकोर्ट में जज बदलने की मांग

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से क्यों खफा हैं केजरीवाल? हाईकोर्ट में जज बदलने की मांग

दिल्ली की सियासत और कथित शराब नीति घोटाले का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. राउज एवेन्यू कोर्ट से बड़ी राहत मिलने के बाद अब यह पूरा मामला दिल्ली हाईकोर्ट की दहलीज पर है, लेकिन यहां एक नया पेंच फंस गया है. आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय को पत्र लिखकर जज बदलने की गुहार लगाई है. पार्टी ने वर्तमान में मामले की सुनवाई कर रहीं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उन पर ‘पक्षपात’ का आरोप लगाया है. यह अप्रत्याशित कदम न केवल कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है, बल्कि आम जनता के मन में भी न्याय प्रक्रिया और राजनीतिक दांव-पेंच को लेकर कई सवाल खड़े कर रहा है.

कैसे शुरू हुआ जज बदलने का यह पूरा विवाद?

दरअसल, हाल ही में निचली अदालत (राउज एवेन्यू कोर्ट) ने उत्पाद शुल्क नीति मामले में अरविंद केजरीवाल समेत 22 लोगों को बड़ी राहत देते हुए आरोप मुक्त कर दिया था. इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सोमवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए अरविंद केजरीवाल और अन्य सभी आरोपियों को नोटिस जारी कर दिया. इसके साथ ही, अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की और निचली अदालत द्वारा सीबीआई अधिकारियों पर की गई कड़ी टिप्पणियों पर भी रोक लगा दी. इसी घटनाक्रम के बाद आम आदमी पार्टी ने मोर्चा खोल दिया और बुधवार को एक लिखित ज्ञापन सौंपकर मामले को किसी अन्य ‘निष्पक्ष’ पीठ को सौंपने की मांग कर डाली.

भाजपा नेताओं के बयानों ने कैसे बढ़ाई तल्खी?

इस कानूनी लड़ाई ने उस वक्त पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले लिया, जब भाजपा नेताओं की टिप्पणियां सामने आईं. दिल्ली सरकार के मंत्री और AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने इन बयानों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सीधा सवाल दागा. उन्होंने कहा कि जब मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और हाईकोर्ट में कानूनी प्रक्रिया चल रही है, तो भाजपा नेताओं को पहले से कैसे पता है कि आगे क्या फैसला आने वाला है?

भारद्वाज ने विशेष रूप से दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा और मंत्री कपिल मिश्रा के बयानों का हवाला दिया. सचदेवा ने सार्वजनिक मंच से AAP नेताओं को अपराधी बताते हुए उन्हें सजा मिलने का दावा किया था. वहीं, कपिल मिश्रा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा था- ‘पिक्चर अभी बाकी है’. AAP का साफ तौर पर आरोप है कि इस तरह की बयानबाजी जानबूझकर राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने के लिए की जा रही है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी संदेह पैदा होता है.

 कौन हैं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा?

इस हाई-प्रोफाइल विवाद के केंद्र में मौजूद जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का न्यायिक सफर बेहद प्रभावशाली और लंबा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स करने वाली जस्टिस शर्मा को ‘बेस्ट ऑलराउंडर स्टूडेंट’ का सम्मान मिल चुका है. उन्होंने 1991 में एलएलबी और 2004 में एलएलएम की डिग्री हासिल की. दिलचस्प बात यह है कि कानून की गहरी समझ के साथ-साथ उन्होंने जनसंपर्क, विज्ञापन और मार्केटिंग मैनेजमेंट में भी डिप्लोमा किया है.

उनका न्यायिक करियर काफी कम उम्र में शुरू हुआ था. वह महज 24 साल की उम्र में मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हो गई थीं और 35 साल की उम्र तक आते-आते सत्र न्यायाधीश बन गईं. अपने करियर में उन्होंने तीस हजारी, पटियाला हाउस और रोहिणी कोर्ट में महिला उत्पीड़न की जांच करने वाली समितियों की अध्यक्षता की. इसके अलावा वह सीबीआई की विशेष न्यायाधीश, परिवार न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण की अहम जिम्मेदारियां भी संभाल चुकी हैं. मार्च 2022 में ही उन्होंने राउज एवेन्यू कोर्ट में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था.

अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी की इस गंभीर मांग पर दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश क्या रुख अपनाते हैं. यह मामला सिर्फ एक राजनीतिक दल की कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की न्याय प्रणाली में आम आदमी के विश्वास से भी जुड़ा है.