भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव आम है. पाकिस्तान के जन्म से लेकर अब तक यह साबित होता आ रहा है. साल 1947 में बंटवारे के बाद से शुरू यह सिलसिला रुका नहीं है. कभी घोषित युद्ध हुए तो कई बार अघोषित या छद्म युद्ध भी सामने आते रहे हैं. कहा जा सकता है कि यह अब रोज की बात जैसे लगती है. पहलगाम में हुआ आतंकी हमला भी इसी तरह का एक कुत्सित प्रयास था, जिसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाकर पाकिस्तान के अंदर कई आतंकी ठिकाने ध्वस्त किए.
आइए, 79वें स्वतंत्रता दिवस के बहाने जानते हैं कि इन टकरावों के पीछे प्रमुख कारण क्या रहे हैं? हालांकि, इसके पीछे कश्मीर विवाद, सीमा-निर्धारण की असहमति बताई जाती है लेकिन आंतरिक-राजनीतिक दबाव, और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में इसके कारण रहे हैं.
साल 1947-48 का प्रथम कश्मीर युद्ध
विभाजन के बाद भारत-पाकिस्तान अभी खुद को स्थापित करने की दिशा में अपने-अपने तरीके से काम करना शुरू भी नहीं कर पाए थे कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ रहने को औपचारिक विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किया गया. और यही पहले युद्ध का तात्कालिक कारण बन गया. पाकिस्तान की पश्चिमोत्तर सीमांत से आए कबायली लड़ाकों और अनियमित बलों के कश्मीर में घुसने से संघर्ष शुरू हुआ.
भारत ने श्रीनगर की रक्षा के लिए वायुसेना के जरिए सैनिक पहुंचाए और धीरे-धीरे मोर्चा संभाला. लड़ाई परंपरागत और अनियमित दोनों प्रकार की रही, कभी नगरों/सड़कों की रक्षा, कभी पहाड़ी दर्रों पर कब्ज़े की रस्साकशी चली. अंततः संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम लागू हुआ. परिणाम यह रहा कि कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया, भारत के पास जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का बड़ा भाग रहा, जबकि पाकिस्तान के कब्ज़े में आज़ाद जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान रहा. यह युद्ध भविष्य के सभी संघर्षों की वैचारिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि बन गया. जो किसी न किसी रूप में आज तक कायम है.
ऑपरेशन जिब्राल्टर से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक
पाकिस्तान चुप नहीं बैठा. सीमा पार से कुछ न कुछ खुराफातें जारी रहीं. तब शुरू हुआ साल 1965 का घोषित युद्ध. यह संघर्ष कई चरणों में बढ़ा. पहले रन ऑफ कच्छ क्षेत्र में झड़पें हुईं, फिर अगस्त में ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कश्मीर में घुसकर विद्रोह भड़काने की कोशिश की. भारत ने घुसपैठ का जवाब देते हुए जवाबी सैन्य कार्रवाई की, और सितंबर में लड़ाई अंतरराष्ट्रीय सीमा तक फैल गई, लाहौर और सियालकोट सेक्टरों में बड़े पैमाने पर टैंक और पैदल सेना की भिड़ंत हुई. वायुसेना की भूमिका निर्णायक रही. दोनों पक्षों को नुकसान हुए.
अंततः संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते युद्धविराम हुआ. इसी के बाद साल 1966 में ताशकंद समझौता हुआ, जिसके तहत दोनों पक्ष युद्ध-पूर्व स्थितियों पर लौटे. सामरिक तौर पर यह युद्ध अनिर्णीत माना जाता है, लेकिन रणनीतिक स्तर पर भारत ने पाकिस्तान की घुसपैठ-आधारित रणनीति को विफल किया.
साल 1971 का भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश का जन्म
साल 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध दक्षिण एशिया के इतिहास का सबसे निर्णायक अध्याय है. उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में राजनीतिक अधिकारों और चुनाव परिणामों की अवहेलना, दमनकारी सैन्य अभियान आदि खूब चल रहे थे. मानवीय और सुरक्षा-संबंधी संकट के चलते भारत-पाक तनाव बढ़ा और दिसंबर 1971 में पूर्ण युद्ध छिड़ गया. यह युद्ध दो मोर्चों पर लड़ा गया. पश्चिमी मोर्चे पर भारत ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों को दबोचे रखा ताकि संसाधन बंटे रहें, जबकि पूर्वी मोर्चे पर तेज़, संगठित और संयुक्त अभियान के जरिए ढाका की ओर निर्णायक बढ़त बनाई गई.
भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना के समन्वित संचालन, स्थानीय मुक्ति वाहिनी के सहयोग, और प्रभावी सैन्य-रणनीति के कारण पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी बलों ने 16 दिसंबर 1971 को आत्मसमर्पण किया. परिणामस्वरूप बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया. युद्ध के बाद शिमला समझौता (1972) के तहत भारत-पाक ने युद्धबंदियों और क्षेत्रों की अदला-बदली समेत कई मुद्दों पर व्यवस्था की और जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा तय की गयी. इस युद्ध के आड़ भारत की छवि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त हुई.
साल 1984 का सियाचिन संघर्ष
साल 1984 में हुआ सियाचिन संघर्ष घोषित युद्ध नहीं था, पर सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ संघर्ष दोनों देशों की सैन्य और लॉजिस्टिक क्षमता की परीक्षा बन गया. भारत ने ऑपरेशन मेघदूत के जरिए सियाचिन की ऊंचाइयों पर महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बढ़त हासिल की. सियाचिन पर लड़ाई से अधिक मौतों का कारण मौसम, हिमस्खलन और ऑक्सीजन की कमी रही.
वर्षों तक रुक-रुक कर झड़पें और तैनाती जारी रही, और बाद के वर्षों में संघर्ष की तीव्रता कम करने के उपाय किए गए. परिणामस्वरूप वास्तविक नियंत्रण रेखा से ऊपर के इस क्षेत्र में भारतीय बढ़त कायम रही. सियाचिन ने दिखाया कि भूगोल, मौसम और रसद कई बार गोलियों से ज़्यादा निर्णायक साबित हो सकते हैं.
कारगिल संघर्ष 1999 में तब उभरा जब पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों और सैनिकों ने कारगिल-ड्रास-बटालिक क्षेत्र की ऊंचाइयों पर सर्दियों के दौरान खाली रहने वाले भारतीय चोटियों और चौकियों पर कब्ज़ा जमा लिया. भारत ने इसे अति गंभीर उल्लंघन माना और ऑपरेशन विजय के तहत ऊंचाइयों को पुनः हासिल करने का अभियान चलाया. कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, ऊंचाई, दुश्मन की स्थिति और प्रतिकूल मौसम के बावजूद भारतीय सेना ने एक-एक चोटी को संगठित पैदल आक्रमण, तोपखाने और वायुसेना के सीमित इस्तेमाल से वापस लिया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा. अंततः पाकिस्तान ने वापसी की, और भारत ने अधिकांश खोए हुए ठिकाने पुनः प्राप्त कर लिए. कारगिल का परिणाम यह रहा कि नियंत्रण रेखा की पवित्रता पर जोर बढ़ा, भारत की सैन्य-राजनीतिक समन्वय क्षमता पर विश्वास मजबूत हुआ, और पाकिस्तान की नीति-निर्माण पर अंतरराष्ट्रीय संदेह गहराया.
युद्ध से कम नहीं रहे ये संघर्ष
भारत-पाक संबंधों में कई ऐसे क्षण आए जब पूर्ण-युद्ध की दहलीज छूकर स्थिति संभली, या सीमित सैन्य कार्रवाइयाँ हुईं जो औपचारिक युद्ध नहीं कहलातीं, पर प्रभाव व्यापक रहा. पहला, 1965 से ठीक पहले रन ऑफ कच्छ में झड़पें हुईं, जिन्होंने संबंधों में अविश्वास और सैन्य सक्रियता को हवा दी और सितंबर 1965 के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की. साल 1986-87 का ऑपरेशन ब्रासटैक्स एक बड़ा सैन्याभ्यास था, जिसे पाकिस्तान ने संभावित हमले की तैयारी माना.
तनाव बहुत बढ़ा पर कूटनीतिक चैनलों से स्थिति संभली. साल 1990 में कश्मीर की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक अस्थिरता ने परमाणु-युग के शुरुआती गंभीर संकटों में से एक को जन्म दिया. बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से तनाव घटा. साल 2001 के संसद हमले के बाद ट्विन पीक्स स्टैंडऑफ में दोनों देशों ने सीमाओं पर भारी सैन्य जमावड़ा किया. कई महीनों तक युद्ध का खतरा बना रहा, पर अंततः कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव से टला.
साल 2016 के उड़ी हमले के बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा की, जिसके तहत सीमित, लक्षित और समय-सीमा में बंधी कार्रवाई की गयी. इसका उद्देश्य आतंकी ढांचों और लॉन्च-पैड्स को निशाना बनाना था. साल 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत द्वारा बालाकोट में फिर सर्जिकल स्ट्राइक की. ये सभी घटनाएं घोषित युद्ध नहीं थीं, पर इनके सामरिक और कूटनीतिक परिणाम दूरगामी रहे.
क्यों होते रहे ये युद्ध?
इन संघर्षों के मूल में जम्मू-कश्मीर को पाने की पाकिस्तान की जिद, ऐतिहासिक अविश्वास जैसे अनेक मुद्दे शामिल हैं. सीमा-रेखाओं का कठिन भूगोल, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में, और सियाचिन जैसी रणनीतिक ऊँचाइयाँ भी टकराव को उकसाती हैं. घरेलू राजनीतिक दबाव, शासन-परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय वातावरण आदि की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. अक्सर आतंकी हमले या सीमावर्ती घुसपैठ जैसी घटनाएँ व्यापक रणनीतिक अंतर्विरोधों को उभार देती हैं, जिससे तनाव बढ़कर सैन्य मुकाबले का रूप ले लेता है.
क्या निकला परिणाम?
1947-48 का परिणाम था, कश्मीर का विभाजन और समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण, जिसने आगे के दशकों की दिशा तय की. 1965 ने दिखाया कि सीमित घुसपैठ रणनीति के भरोसे निर्णायक सफलता कठिन है; दोनों पक्षों के लिए स्थायी समाधान कूटनीतिक स्तर पर ढूंढना जरूरी है. 1971 ने उपमहाद्वीप के राजनीतिक मानचित्र को बदला, बांग्लादेश का जन्म हुआ. 1984 से सियाचिन पर भारतीय बढ़त और 1999 के कारगिल में LoC की पवित्रता पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन ने संकेत दिया कि यथास्थिति बदलने की कोशिशों की कीमत भारी पड़ती है.
दीर्घकालिक असर यह हुआ कि दोनों देशों ने सीमा-प्रबंधन, संचार-हॉटलाइन, युद्धबंदियों और नागरिकों के साथ व्यवहार, तथा सीमावर्ती व्यापार/यातायात जैसे तंत्र विकसित किए. समय-समय पर युद्धविराम समझौतों को पुनर्स्थापित किया गया, विशेषकर 2003 और हाल में फिर से नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम की पुष्टि हुई. हालांकि राजनीतिक समाधान के बिना सैन्य शांति अस्थिर रहती है और यह इतिहास बार-बार दिखाता है.
खतरा अभी भी टला नहीं है. भारतीय थलसेना प्रमुख ने हाल ही में सार्वजनिक तौर पर कहा है कि भारत-पाकिस्तान फिर से आमने-सामने आ सकते हैं. युद्ध का खतरा टला नहीं है. उधर, पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कुछ दिन पूर्व ही अमेरिकी धरती से परमाणु शक्ति होने की धमकी दी है. पाक सेना का प्रभाव देश की राजनीति पर कुछ ज्यादा ही है. कहा जा सकता है कि सेना मजबूत है और सरकार कमजोर. तख्तापलट इसके उदाहरण रहे हैं. पाकिस्तान के वे नेता भी गीदड़-भुभकी देने से बाज नहीं आते, जिनके पास अंतर्राष्ट्रीय मामलों में बोलने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसे में समय-समय पर तनाव आम है.



