दालों के आयात में 67% की भारी उछाल, फिर भी कीमतों से राहत नहीं! चने के भाव भी चढ़े, आगे और महंगाई का खतरा

दालों के आयात में 67% की भारी उछाल, फिर भी कीमतों से राहत नहीं! चने के भाव भी चढ़े, आगे और महंगाई का खतरा

देश में दालों की कीमतों से राहत मिलने की उम्मीद फिलहाल कमजोर पड़ती दिख रही है। घरेलू फसल उत्पादन को लेकर चिंताओं और संभावित अल नीनो के मौसम संबंधी जोखिमों के बीच भारत में दलहन का आयात तेजी से बढ़ा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती पांच महीनों में दालों का कुल आयात 67 फीसदी बढ़कर 20.6 लाख टन पहुंच गया। इसके बावजूद तुअर, चना और उड़द जैसी प्रमुख दालें खुदरा बाजार में महंगी बनी हुई हैं। चने की कीमतों में भी पिछले एक महीने के दौरान अच्छी-खासी तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में आम उपभोक्ताओं के लिए रसोई का बजट संभालना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

आयात बढ़ा, लेकिन आम आदमी को दालों की महंगाई से राहत क्यों नहीं?

दलहन की विदेशी खरीद बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतों का ऊंचा बने रहना चिंता का विषय है। आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में दलहन आयात का कुल मूल्य भी 38 फीसदी बढ़कर 1.18 अरब डॉलर हो गया। यानी भारत ने इस अवधि में न केवल ज्यादा मात्रा में दालें आयात कीं, बल्कि उन पर खर्च भी पिछले साल के मुकाबले काफी बढ़ गया।

खुदरा बाजार में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। शनिवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, तुअर दाल की औसत कीमत 132.75 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई। यह पिछले साल की तुलना में 15 फीसदी अधिक है। इसी तरह चने की कीमत 93.48 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जिसमें सालाना आधार पर 7.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

उड़द दाल भी उपभोक्ताओं को महंगी मिल रही है। इसकी कीमत 125.46 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है, जो पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी अधिक है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आयात बढ़ने के बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल राहत नहीं मिली है। घरेलू उत्पादन को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

मसूर और पीली मटर की विदेशी खरीद में भी बड़ा उछाल

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के प्राइस मॉनिटरिंग सेल के आंकड़ों के मुताबिक, इस वित्त वर्ष में कई प्रमुख दलहनों का आयात तेजी से बढ़ा है। इनमें मसूर और पीली मटर सबसे आगे हैं।

मसूर का आयात पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 200 फीसदी बढ़कर 6.4 लाख टन हो गया। वहीं, पीली मटर की विदेशी खरीद 114 फीसदी बढ़कर 6.2 लाख टन दर्ज की गई। तुअर के आयात में भी 10 फीसदी की वृद्धि हुई और यह 3.5 लाख टन तक पहुंच गया।

हालांकि, सभी दलहनों के आयात में बढ़ोतरी नहीं हुई है। उड़द का आयात 3 फीसदी घटकर 2.7 लाख टन रह गया।

आयात के इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत की दलहन जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी खरीद महत्वपूर्ण बनी हुई है। लेकिन आयात की मात्रा बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि खुदरा कीमतें तुरंत नीचे आ जाएंगी। मौजूदा आंकड़ों में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है।

एक महीने में चने के भाव 8% तक चढ़े, बाजार की नजर अब इन तीन बातों पर

दालों के साथ-साथ चने की कीमतों में आई तेजी ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है। पिछले एक महीने में अलग-अलग मंडियों में चने के भाव में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

नई दिल्ली में 25 सितंबर को चने का भाव 7,058.40 रुपये प्रति क्विंटल था। 26 अक्टूबर तक यह बढ़कर 7,499.90 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। इसी अवधि में अकोला में कीमत 6,862.50 रुपये से बढ़कर 7,400 रुपये प्रति क्विंटल हो गई।

बीकानेर के आंकड़ों में भी कीमत बढ़ने का रुझान दिखाई देता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों में 25 सितंबर के भाव के साथ दिया गया मूल्य और दर्ज प्रतिशत वृद्धि आपस में मेल नहीं खाते। इसलिए वहां की सटीक वृद्धि की पुष्टि जरूरी है।

दिल्ली स्थित कृषि कमोडिटी रिसर्च संस्थान आईग्रेन इंडिया के निदेशक राहुल चौहान के अनुसार, आने वाले समय में चने की कीमतों की दिशा मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करेगी।

पहला, ऑस्ट्रेलिया से भारत में चने की कितनी खेप पहुंचती है। दूसरा, सरकारी एजेंसियां नेफेड और एनसीसीएफ अपने बफर स्टॉक से कितनी मात्रा में चना बाजार में बेचती हैं। तीसरा, आगामी रबी सीजन में देश में चने की बुवाई का वास्तविक रकबा कितना रहता है।

इन तीनों कारकों का असर बाजार में चने की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।

रबी सीजन और अल नीनो पर टिकी बाजार की नजर, उपभोक्ताओं के लिए अहम होंगे अगले महीने

दलहन बाजार में आगे क्या होगा, इसका जवाब काफी हद तक घरेलू फसल उत्पादन और मौसम की परिस्थितियों से जुड़ा है। संभावित अल नीनो के कारण मौसम संबंधी जोखिमों को लेकर चिंता बनी हुई है। इसी बीच घरेलू उत्पादन को लेकर अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता बाजार के लिए अहम मुद्दे बन गए हैं।

यदि घरेलू उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता, तो बाजार में दालों की उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, विदेश से आने वाली खेप और सरकारी एजेंसियों के बफर स्टॉक से होने वाली बिक्री कीमतों की दिशा को प्रभावित कर सकती है।

आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि बढ़ते आयात का फायदा खुदरा कीमतों में कब दिखाई देगा। तुअर, चना और उड़द के मौजूदा भाव बताते हैं कि अभी राहत मिलना आसान नहीं है। वहीं, चने में जारी तेजी पर भी बाजार की नजर बनी रहेगी।