इंदौर मेट्रो परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए 150 से अधिक पेड़ों की कटाई का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन अब यह काम मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकेगा। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पेड़ काटने पर रोक लगाने से इनकार करते हुए पक्षियों की सुरक्षा के लिए कई अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ कहा कि पेड़ों की कटाई और शाखाओं की छंटाई कम से कम दो पक्षी विशेषज्ञों की निगरानी में चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। मौके पर वन्यजीव बचाव दल भी मौजूद रहेगा, ताकि घोंसलों से गिरने वाले बच्चों और घायल पक्षियों को तुरंत मदद मिल सके। मेट्रो निगम को ढाई हजार नए पेड़ लगाने और उनकी देखभाल का रिकॉर्ड अदालत में पेश करने का भी निर्देश दिया गया है।
150 से ज्यादा पेड़ और करीब 1,000 पक्षियों के घोंसलों पर चिंता
इंदौर मेट्रो परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई का मुद्दा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंचा था। जनहित याचिका में आशंका जताई गई कि परियोजना के लिए 150 से अधिक पेड़ काटे जा सकते हैं। इससे करीब एक हजार पक्षियों के घोंसले प्रभावित होने का खतरा है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि ये पेड़ शहर में बड़ी संख्या में आने वाले पक्षियों के लिए अहम ठिकाना हैं। कुछ पक्षियों ने यहां घोंसले भी बनाए हैं, जबकि कई पक्षी रात में इन पेड़ों पर ठहरते हैं। ऐसे में अचानक पेड़ काटने से उनके बसेरे उजड़ सकते हैं।
इस मामले में नेचर वॉलंटियर्स सोसाइटी भी हस्तक्षेपकर्ता के रूप में शामिल हुई। सुनवाई से पहले 29 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों और उनके वकीलों के साथ संबंधित स्थल का निरीक्षण भी किया था।
हालांकि, अदालत ने मेट्रो परियोजना के लिए पेड़ काटने पर पूरी तरह रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उसने निर्देश दिया कि विकास कार्य के दौरान पक्षियों को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जरूरी सावधानियां बरती जाएं।
एक साथ नहीं कटेंगे पेड़, विशेषज्ञों की निगरानी में होगी कार्रवाई
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा कि सभी पेड़ों को एक साथ काटना पक्षियों के लिए गंभीर परेशानी पैदा कर सकता है। अचानक उनका बसेरा छिनने से उन्हें अत्यधिक तनाव हो सकता है और नए ठिकाने पर जाने में मुश्किल आ सकती है।
इसी वजह से कोर्ट ने पेड़ों की कटाई और शाखाओं की छंटाई चरणबद्ध तरीके से करने का निर्देश दिया। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम दो पक्षी विशेषज्ञों की निगरानी और सलाह जरूरी होगी।
विशेषज्ञों को पेड़ों पर मौजूद घोंसलों, अंडों और उनमें पल रहे बच्चों का विशेष ध्यान रखना होगा। इसके अलावा, मौके पर वन्यजीव बचाव दल की मौजूदगी भी अनिवार्य होगी। बचाव दल के पास जाल और मेडिकल किट होनी चाहिए, ताकि घायल पक्षियों और घोंसलों से नीचे गिरने वाले बच्चों को समय पर सहायता मिल सके।
अदालत ने यह भी कहा कि अगर आसपास पर्याप्त जगह उपलब्ध है, तो वहां उसी प्रकार के पेड़ लगाए जाएं। इससे परियोजना का काम पूरा होने तक पक्षियों को दोबारा बसेरा मिलने में मदद मिल सकती है।
पीठ ने पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् और याचिका में हस्तक्षेपकर्ता भालचंद्र मोंढे को भी ऐसे उपाय सुझाने के लिए कहा, जिनसे पक्षियों को बिना ज्यादा परेशानी के आसपास के दूसरे पेड़ों पर जाने का समय मिल सके।
मेट्रो निगम लगाएगा 2,500 पेड़, हर साल देनी होगी रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान मेट्रो निगम ने अदालत को बताया कि काटे जाने वाले पेड़ों की भरपाई के लिए 2,500 पेड़ लगाए जाएंगे। हाईकोर्ट ने निगम को अपने इस आश्वासन का पालन करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि पौधारोपण से जुड़ी पहली रिपोर्ट एक साल के भीतर हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा की जाए। इसके बाद लगाए गए पेड़ों की देखभाल सुनिश्चित करनी होगी। हर साल अप्रैल में उनकी स्थिति की रिपोर्ट और गूगल से प्राप्त तस्वीरें भी अदालत की रजिस्ट्री में दाखिल करनी होंगी।
पीठ ने पक्षी विशेषज्ञों की सेवाओं के लिए राज्य सरकार को प्रत्येक विशेषज्ञ को 10,000 रुपये पारिश्रमिक देने का निर्देश भी दिया।
इन निर्देशों का महत्व इसलिए है क्योंकि केवल नए पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी देखभाल और आगे की स्थिति की जानकारी भी अदालत के सामने रखनी होगी। इस तरह मेट्रो निगम को पेड़ों की कटाई के साथ-साथ पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए किए जाने वाले उपायों का हिसाब भी देना होगा।
मेट्रो का रूट बदलने की मांग पर क्या बोला निगम?
याचिका में पेड़ों की कटाई के अलावा मेट्रो के रूट और स्टेशन की जगह को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ता की ओर से पूछा गया कि पलासिया से रेलवे स्टेशन तक मेट्रो का मार्ग सीधा होने के बजाय घुमावदार क्यों है। यह भी सवाल उठाया गया कि क्या भूमिगत मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए आसपास की किसी दूसरी जमीन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने पहले रेल निगम को ऐसी वैकल्पिक जमीनों से संबंधित योजनाएं पेश करने का निर्देश दिया था, जिन्हें भूमिगत स्टेशन बनाने के लिए अधिग्रहित किया जा सकता था।
मेट्रो निगम ने अदालत को बताया कि मार्ग तय करते समय क्षेत्र में पक्षियों के बसेरे की जानकारी थी और निर्माण से जुड़ी विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया था। निगम के अनुसार, स्टेशन को दूसरी जगह ले जाना संभव नहीं है, क्योंकि वहां पर्याप्त खाली जमीन उपलब्ध नहीं है। उसने यह भी कहा कि पेड़ों की कटाई के लिए वन विभाग से जरूरी अनुमति ली गई है और परियोजना से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का उल्लंघन नहीं होगा।
निगम ने यह भी बताया कि मेट्रो स्टेशन की जगह और मार्ग से जुड़ा मुद्दा पहले एक अन्य याचिका में उठाया गया था, जिसे हाईकोर्ट की समकक्ष पीठ ने खारिज कर दिया था।
पीठ ने राज लक्ष्मी फाउंडेशन बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में वर्ष 2024 की रिट याचिका संख्या 10909 से जुड़े पहले के फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि उस फैसले को देखते हुए परियोजना में दोबारा हस्तक्षेप करना समकक्ष पीठ के आदेश के विपरीत होगा। इसलिए पेड़ों की कटाई रोकने का आधार नहीं बनता।
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।
आम लोगों के लिए क्या मायने हैं इस फैसले के?
इंदौर मेट्रो शहर के परिवहन ढांचे से जुड़ी एक अहम परियोजना है, लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि विकास कार्य के दौरान पक्षियों और पर्यावरण की अनदेखी नहीं की जा सकती। पेड़ों की कटाई की अनुमति के साथ विशेषज्ञों की निगरानी, वन्यजीव बचाव दल की मौजूदगी और 2,500 नए पेड़ लगाने की शर्तें इसी संतुलन की कोशिश हैं। अब इन निर्देशों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कटाई के दौरान कितनी सावधानी बरती जाती है और नए लगाए गए पेड़ों की देखभाल कितनी प्रभावी ढंग से होती है।
