आईपीएल में इस समय जो हो रहा है, वह क्रिकेट के पारंपरिक संतुलन को चुनौती देता दिख रहा है। बड़े-बड़े स्कोर अब आम बात हो गए हैं। 240-250 रन भी सुरक्षित नहीं माने जा रहे। हाल ही में 265 रन का लक्ष्य 7 गेंद पहले हासिल कर लिया गया, और मुंबई इंडियंस जैसी मजबूत बॉलिंग लाइन-अप भी 243 रन डिफेंड नहीं कर सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है—क्या क्रिकेट पूरी तरह बल्लेबाजों का खेल बनता जा रहा है? इस पर सनराइजर्स हैदराबाद के स्पिन बॉलिंग कोच और दिग्गज स्पिनर मुथैया मुरलीधरन ने खुलकर अपनी बात रखी है।
‘गेम की मांग बदल गई है’, गेंदबाजों को करनी होगी स्वीकार्यता
मुंबई इंडियंस और सनराइजर्स हैदराबाद के मैच के बाद मुरलीधरन ने साफ कहा कि गेंदबाजों को अब यह मानना होगा कि उन्हें मार पड़ेगी। उनके मुताबिक, आज का टी20 क्रिकेट पूरी तरह आक्रामक बल्लेबाजी की ओर झुक चुका है। उन्होंने बताया कि पहले पावरप्ले में 40-50 रन अच्छे माने जाते थे, लेकिन अब यही आंकड़ा 70-80 तक पहुंच गया है। हर टीम में ऐसे ओपनर हैं जो विकेट की चिंता किए बिना सिर्फ बड़े शॉट्स खेलने पर ध्यान देते हैं। मुरलीधरन ने उदाहरण देते हुए कहा कि अब युवा बल्लेबाज बिना किसी झिझक के बड़े गेंदबाजों पर भी हमला कर रहे हैं। जसप्रीत बुमराह जैसे विश्वस्तरीय गेंदबाज भी छक्के खा रहे हैं। सलिल अरोड़ा द्वारा बुमराह पर लगाया गया ‘नो-लुक सिक्स’ इसी बदलाव का संकेत है।
स्पिन भी असरदार, लेकिन जमीनी तैयारी में कमी
मुरलीधरन का मानना है कि स्पिन गेंदबाजी आज भी प्रभावी हो सकती है, लेकिन समस्या इसकी बुनियादी ट्रेनिंग में है। उन्होंने कहा कि युवा खिलाड़ी बचपन से गेंद को टर्न कराने की बजाय सिर्फ तेज फेंकने पर ध्यान दे रहे हैं। उनके मुताबिक, स्पिन की कला 10-12 साल की उम्र में विकसित होती है। अगर उस समय सही अभ्यास नहीं मिला, तो आगे जाकर इसे सुधारना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि आज के स्पिनर बल्लेबाजों को चकमा देने के बजाय सिर्फ रन रोकने की कोशिश करते नजर आते हैं।
‘एंटरटेनमेंट है असली खेल’, बिजनेस का दबाव भी बड़ा फैक्टर
आईपीएल में बैट और बॉल के बीच संतुलन कैसे आए, इस सवाल पर मुरलीधरन ने एक अहम पहलू उठाया—बिजनेस और दर्शकों की पसंद। उन्होंने कहा कि अगर विकेट को ज्यादा संतुलित बना दिया गया, तो दर्शकों को मैच धीमा और उबाऊ लग सकता है। उनके अनुसार, टी20 फॉर्मेट का दर्शक चौके-छक्के देखना चाहता है। यही वजह है कि टूर्नामेंट की संरचना भी उसी हिसाब से बनाई गई है। इम्पैक्ट प्लेयर जैसे नियम भी बल्लेबाजी को बढ़ावा देते हैं। अगर इस फॉर्मेट में बदलाव किया गया, तो स्पॉन्सर और दर्शकों की दिलचस्पी पर असर पड़ सकता है।
आगे का रास्ता: गेंदबाजों को खुद ढूंढना होगा समाधान
मुरलीधरन का मानना है कि यह ट्रेंड फिलहाल जारी रहेगा। हालांकि, समय के साथ गेंदबाज खुद को ढालने की कोशिश करेंगे और नई रणनीतियां विकसित करेंगे। लेकिन यह बदलाव तुरंत नहीं आएगा। आम दर्शक के लिए यह दौर रोमांचक जरूर है, लेकिन खेल के संतुलन को लेकर बहस भी तेज हो रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्रिकेट किस दिशा में आगे बढ़ता है—पूरी तरह बल्लेबाजों का खेल या फिर संतुलन की वापसी।


